निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३४२ ) १० अ० ३ पा० १ खं० हुये धातुओं को अग्नि (तत्व) पकाता है, जिससे इनकीदृढता होती है, इसके अनन्तर विश्वकर्मा देवता अपने वायु रूप शरीर से उस शरीर में प्रवेश करके इस सब अद्भुत जगत् को कर्त्ता है, जो आत्मविचार से रहित पुरुषों को अचिन्त्य या दुर्जेय है। अर्थात् मध्यम लोक का देवता वायु है. और उसी के अनुप्रवेश से सब अन्य तत्व चलते हैं या क्रिया करते हैं, अतः उसी के अधीन सब जगत् बनता है, इस लिये मध्यम लोक का देवता वायुही विश्व का करने वाला होने से 'विश्वकर्मा' होता है । जैसा कि-वैश्वकर्मण हवि.के अधिकार में साम्- मेध में कहा है । “अथैष वैश्वकर्मणो,विश्वानि मे कर्माणि कृतान्या- सन्निति विश्वकर्मा हि सोऽभवत्” अर्थात्- अब यह विश्वकर्मा का है, 'सारे मेरे किये हुये कर्म हैं, इस से वह 'विश्वकर्मा' हुआ' । उस विश्वकर्मा देवने ऐसा ध्यान किया कि- 'सब कर्म मेरे किये हुये हैं, इसी से उसका 'विश्वकर्मा' नाम होगया । मन्त्र में भी विश्वकर्मा के मध्यम होने का लिङ्ग मिलता है । जैसे विश्वकर्मा के सूक्त में— “तमिद्गर्भं प्रथमं दध्न आपः” (ऋ०सं०८,३,१७,६) अर्थात्- जलों ने उसी को आश्रय करके पहिला गर्भ धारण किया । जल का गर्भ धारण मध्यम लोक ही में होता है । और विषुवत् कर्म में विश्वकर्मा के ग्रहके अधिकार में श्रुति में कहा है कि- “ इन्द्रो वै वृत्रमहन् स इमं लोकमभ्यजय