निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 1110, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३४६ ) १० अ० ३ पा० २ खं० (संमोदन्ते) आनन्द भोगते हैं। कहां ? “यत्रासप्त ऋषीन् पर एक माहुः” ( यत्र एतानि सप्त ऋषीयानि ज्योतींषि, तेभ्यः परः आदित्यः, तानि एतस्मिन् एकीभवन्ति ) जहां ये जलके खेंचने वाली रश्मिएं या ज्योतिरं एक होती हैं, उनसे पर उस आदित्य मण्डल में उसके अधिष्ठाता आदित्य देव में । अर्थात्-जो विश्वकर्मा देव सब जगत् का कर्त्ता हर्त्ता और सब के शुभ अशुभ कमों का जानने वाला है, उसके जो भक्त हैं, वे उस मध्यम लोक के जल देवता के प्रसाद को प्राप्त होकर उसकी सूक्ष्म जल मात्राओं के साथ उस देवता के सदृश रूपसे आदित्य मण्डलमें आनन्दका उपभोग करते हैं,जहां अनन्त रश्मिएं एक रूप हो जाती हैं । क्योंकि-जिस देवता की पुरुष उपासना करता है,वह उसी के लोक में उसकी सात्मता तद्रूपता को प्राप्त होकर रहता है । यह इस मन्त्रका अधिदैव अर्थ है । जिस में देवता को अधिकार करके वर्णन किया जावे, वह मन्त्र का व्याख्यान अधिदैवत कहलाता है । उस व्याख्यान में मन्त्र के सब शब्दों का अर्थ उसी प्रकार कहा जाता है, जैसा कि-उस देवता में जिसकी वहां स्तुति हो, घटता हो ॥ “अथाध्यात्मम्” अब इसी मन्त्र का अध्यात्म अर्थ कहते हैं । जिसमें आत्मा के अधिकार से अर्थ कहाजावे, वह मन्त्र का व्याख्यान अध्यात्म कहलाता है । इस व्याख्यान में आत्म पदार्थ के अनुकूल ही सब शब्दों का अर्थ होता है। ‘विश्वकर्मा’ सब जगत् का कर्त्ता परमात्मा, जो प्रति शरीर में क्षेत्रज्ञ के रूप से वर्त्तमान है, और वायु की चलन