भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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क्रिया को कर रहा है- जिसकी प्रेरणा से वायुमें चलन(हिल- ना) क्रिया उत्पन्न होती है, और वायु की क्रियासे सब प्राणी या भूत क्रियावान् होजाते हैं, इस प्रकार जो सबका कर्त्ता है- सब की क्रिया शक्ति का आधार है केवल इतनाहीनहीं किन्तु वह 'विमनाः' (विभूतमनाः) सब भूतों की ज्ञानशक्ति का आधार भी है, 'आदुविहायाः ' महान् है, केवल महान् ही नहीं, किन्तु वह 'धाता' अपनी शक्ति विशेष का रचने वाला और उस शक्ति के विषयों का 'विधाता' करने वाला भी है, 'परमः' सबसे ऊंचा है, 'सन्दृक्'(संदर्शयिता) (इन्द्रि- याणाम्) इन्द्रियों में ज्ञान के उत्पन्न करने की शक्ति कोदेने वाला है, क्यों कि- वही विषय (रूप आदि) और विषयि (इन्द्रिय) के सम्बन्ध का करने वाला तथा उन इन्द्रियों में उनके भिन्न २ विषयों के प्रति आलोक (प्रकाश) शक्ति को फैलाने वालो है, 'तेषाम्' उस विश्वकर्मा (परमात्मा)केविभूति रूप उन भूतोंमें जो उसके 'इष्टानि' प्यारे हैं,वे 'इषा' (अन्ने- नसह) अन्न या शक्ति मात्रके सहित 'संमदन्ति' (सम्मॊदन्ते) मोद को प्राप्त होते हैं- तृप्त होते हैं। कहां " यत्रा सप्त ऋषीन् पर एकमाहुः” (यत्र इमानि सप्त ऋषीणांनि इन्द्रियाणि एभ्यः पर आत्मा, तानि एतस्मिन् एकं भवन्ति ) जहां ये सब सप्तऋषीश इन्द्रिये एक होजाती है, इनसे पर (सूक्ष्म या उत्कृष्ट) आत्मा है, उसी में ये एक होती हैं, और वहीं विश्वकर्मा के इष्ट (प्यारे) मोद करते हैं । इस प्रकार यह मन्त्र आत्मा की गति या स्थिति को वर्णन करता है। "तत्र०" इस आत्म गति में आत्मा के जानने वाले