निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३४८ ) १० अ० ३ पा० ३ खं० इतिहास कहते हैं- विश्वकर्मा भौवन ने सर्वमेध कर्म में सर्व भूतों को होम किया और अन्त में आपे को भी होम कर दिया । जिस अर्थको लेकर "विश्वकर्मा विमनाः०" यह ऋचा आत्मगति से निर्वचन की गई है, उसी इतिहास में वर्णित अर्थ को संमुख भाव से यह ऋचा कहने वाली है । "य इमा विश्वा भुवनानि जुह्वत्०" ( ऋ० सं० ८, ३, १६, १ ) अर्थात्-जिसने इन सब भुवनों (लोकों) को होम किया "तस्य०" उस मन्त्र के बहुत निर्वचन ( व्याख्यान ) के लिये यह अगली ऋचा है ॥२(२६)॥ व्याख्या "विश्वकर्मा" (१६) यह मध्यम लोकका देवता है, जो आदित्यान्तर्वर्ती पुरुष या आदित्यमण्डल के अधिदेवता या हिरण्यगर्भ की अवस्था में एक होता हुआ भी अविद्या या अज्ञान के व्यवधान (परदे) से प्रतिशरीर अलग२ जैसा होते हुआ अपनी विज्ञान शक्ति के द्वारा एक२ शरीर के (प्रत्येक के) अधिकार को अनुभव करता है, और उसके उपासक (भक्त) उसके सायुज्य या सहवास या उसके स्वरूप-प्राप्ति के सुखको भोगते हैं । यह "विश्वकर्मा" इस मन्त्रके अधि- दैवत अर्थ का संक्षेप है । यही अर्थ प्रकरणानुगत है । दूसरा अध्यात्म अर्थ मन्त्र के स्वभावाधीन आचार्य ने दिखाया है, कि-मन्त्रों के इस प्रकार अर्थ भेद भी होते हैं । अध्यात्म अर्थ में 'विश्वकर्मा' परमात्मा है, जो अज्ञान के व्यवधान