निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३४६ ) १० अ० ३ पा० २ खं० से प्रतिशरीर भिन्न २ जीवात्माओं के रूप में प्रतीत होता है। उसकी उपासना से उसी के स्वरूप को प्राप्त होता है। यही अर्थ भले प्रकार प्रमाणित करने के लिये आचार्य ने यहां विश्वकर्मा भौवन का इतिहास भी दिखाया है, जिस में उस ने सर्वमेध = ज्ञान यज्ञ में सब भूतों को आत्मा में और आत्मा को सब भूतों में होम किया है, अर्थात्- एकात्मभाव जो परमात्मा का रूप है, उसे प्राप्त किया है। इसी इतिहास को प्रमाणित करने के लिये “य इमा विश्वा भुवनानि०” यह ऋचा भी दी है। सर्वमेध। इस शब्द के दो अर्थ हैं। एक में यह यज्ञों के समूह की संज्ञा है। जैसे-तीन (३) अश्वमेध, पांच (५) पुरुषमेध, और दो (२) वाजपेय तथा आप्तोर्याम कुल दश यज्ञों के अनुष्ठान करने से सर्वमेध यज्ञ होजाता है। और दूसरे अर्थ में ज्ञान-यज्ञ से प्रयोजन है। उस में- “यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति। सर्व- भूतेषु चात्मानं ततो न विचिकित्सति” (य०सं० ४०, ६) अर्थात्-जो ज्ञानी पुरुष सब भूतों को अपने में ही देखता है, और सब भूतों में अपने को देखता है, वह फिर सन्देह नहीं करता है, किन्तु परमात्मभाव को प्राप्त होकर नित्यसुख को प्राप्त होजाता है। इस मन्त्रोक्त भावके अनुसार अपने तत्व-ज्ञान की दृष्टि से अपने और सब जगत् के बीच में जो भेद है उसका होम कर देता है। इसी अर्थ को प्रमाणित करने के लिये आचार्य “विश्वकर्मन्०” यह और ऋचा अगले खण्ड में देते हैं।