निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइतिहास। इतिहास पहिले के बीते हुये वृत्तान्त को कहते हैं, और उसी के ढंग पर मन्त्रों में भी वह जहां तहां आता ही रहता है, किन्तु नित्य वेद में उसका कदापि संभव नहीं, वह यहां अपने आध्यात्मिक, आधिदैविक या आधि- भौतिक किसी अर्थ के प्रतीत होनेके लिये अर्थवाद मात्र होता है। उसका सब प्रकार का अर्थ मन्त्र में अविवक्षित होता है। कल्पित होने से केवल समझने में वह उपयुक्त होता है, फिर उसे छोड़ दिया जाता है,अर्थात्-मन्त्रों में जो इतिहास होता है, वह उसके अर्थको जानने वालोंके लिये उपदेशार्थ होता है, जिसके सहारे पर केवल अर्थ समझ लिया जाता है और फिर वह ग्राह्य नहीं होता ॥ २, (२६) ॥ ( खं० ३ ) निरु०-‘‘ विश्वकर्मन् ह॒विषा॑ वावृधा॒नः स्वयं यजस्व पृथि॒वीमु॒तद्याम् । मुह्यन्त्वन्ये॑ अभि॒तो जना॑स इ॒हास्माकं॑ म॒घवा॑ सू॒रिर॑स्तु ॥ ’’ [ऋ०सं० ६, ३, १६, ६ । य० वा० सं० १७, २२] ॥ विश्वकर्मन् हविषा वर्द्धयमानः स्वयं यजस्व पृथिवीं च दिवं च, मुह्यन्तु अन्ये अभितो जनाः सपत्नाः,इह अस्माकं मघवासूरिः-अस्तु प्रज्ञाता “तार्क्ष्यः”त्वष्ट्रा व्याख्यातःतीर्णोऽन्तरिक्षे क्षियति तूर्णम्-अर्थ रक्षति । अश्नोतेर्वा । तस्य एषा भवति- ॥ ३ ( २७ ) ॥