निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३५१ ) १० अ० ३ पा० ३ खं० अर्थ :— “विश्वकर्मन्०” विश्वकर्मा की प्रयोगावस्था और फलावस्था दोनोंको देखकर ऋषि कहता है—हे 'विश्व- कर्मन् !' प्रयोग या यज्ञमें अवस्थित = संयुक्त' देव' 'हविषा' इस सर्वमेध की दर्शन-( ज्ञान ) सम्पत्ति से युक्त हविः से 'वावृधानः' (वर्द्धयमानः) बढ़ते हुये 'त्वम्' तुम 'स्वयम्' और उस (यज्ञ) के फलपाक के समय 'पृथिवीम्' पृथ्वी को 'उत- द्याम्' और द्युलोक को 'यजस्व' (व्याप्नुहि) व्यापन करना- हमारे यज्ञके फल देने के समय तुम सब विश्व में फैलजाना, जिससे कि कहीं भी हमें फल भोगने में त्रुटि न हो, अथवा अपने पूर्णरूप से पूर्णसामर्थ्य से हमें पूर्ण फल देना । 'अन्ये' ( सपत्नाः ) और तेरी भक्ति से विमुख शत्रु 'जनासः' जन 'अभितः' ( सर्वतः ) सब ओर से 'मुह्यन्तु' मोहित होवें । 'इह' तेरे इस दर्शनरूप उपासनो कर्म में 'अस्माकम्' हमारा 'सूरिः' ( प्रज्ञाता ) जानने वाला 'मघवा' ( इन्द्रः ) इन्द्रदेव 'अस्तु' होवे । 'तार्क्ष्य' ( ७) शब्द 'त्वष्टृ' शब्द (२,७,६) से व्याख्यात है उसके समान ही इसकी व्याख्या है। जैसे- “तूर्णम् अश्नुते” 'शीघ्र व्यापन करता है' इत्यादि । अथवा ‘तीर्णे अन्तरिक्षे क्षियति' फैले हुए आकाश में निवास करता है, इस लिये 'तार्क्ष्य' है। अथवा तूर्ण (शीघ्र) अर्थ की रक्षा करता है, इससे 'तार्क्ष्य' है । अथवा व्याप्ति अर्थ में 'अश' (स्वा०आ०) धातु से है। क्योंकि वह व्यापन कर लेता है। यहां 'तूर्ण' शब्द से' पूर्वपद ( तार् ) और 'रक्ष' या 'अश' धातु से उत्तरपद 'क्ष्य होता है। “तस्य०” उस 'तार्क्ष्य' देव की यह ऋचा है—॥३(२७)॥