निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३५२ ) १० अ० ३ पा० ४ खं० व्याख्या । पौराणिक या पुराण वेत्ता मानते हैं कि—'विश्वकर्मा', नाम देवशिल्पी या देवताओं के खाती (बढ़ई) का है । उन के मत में भी 'विश्वकर्म' शब्द का स्वाभाविक अर्थ लेने के लिये कलाकौशल विषयक सर्वज्ञता लीजासकती है। यथासंभव शब्द की शक्ति को घटा लेना या संगत कर लेना चाहिये यही निरुक्त शास्त्र का अभिप्राय है ॥३(२७)॥ (खं० ४) निरु०-“त्यमूषु वाजिनं देवजूतं सहावानं तरु- तारं रथानाम् । अरिष्टनेमिं पृतनाजमाशुं स्व- स्तये तार्क्ष्य मिहा हुयेम ॥”[ऋ०सं०८,८,३६,१ । सा० सं० छ०आ० ४,१,५,१] ॥ तं भृशम् अन्नवन्तम् । 'जूति'र्गतिः प्रीति र्वा। 'देवजूतं' देवगतं देवप्रीतं वा । सहस्वन्तं तारयि- तारं रथानाम्, अरिष्टनेमिं पृतनाजितम् आशुं स्वस्तये तार्क्ष्यम्- इह हुयेम- इति कम्- अद्यं मध्यमाद्- एवम् अवक्ष्यत् ॥ तस्य एषा अपरा भवति ॥४(२८)॥ अर्थः- “त्यमूषु०” इस ऋचा का अरिष्टनेमि ऋषि है, विषुवत् के निष्केवल्य मे शस्त्र है । 'त्यम्' (तम्) उस 'वाजिनम्' (भृशम् अन्नवन्तम्) अति- शय अन्नवाले देवजूतम्' ( देवगतम् ) देवताओं से बड़े माने