भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1117

हुये (देवप्रीतं वा) अथवा देवताओं के साथ समान भाव से प्याररखनेवाले। 'सहावानम्' (सहस्वन्तम्) बल वाले 'रथानाम्' रंहण करने वाले या चलने वाले सब प्राणियों के 'तरुतारम्' (तारयितारम्) चलाने वाले 'अरिष्टनेमिम्' किसी से भी न रुकने वाले वज्र के धारण करने वाले 'पृतनाजितम्' (पृतनाजितम् ) शत्रुओं की सेनाओं को जीतने वाले 'आशुम्' शीघ्र गमन वाले 'ताक्ष्र्यम्' ताक्ष्र्य देवको (वयम्) हम 'इह' यहां अपने यज्ञ मे 'स्वस्तये' कल्याण के अर्थ 'हुवेम' (ह्वयेम) बुलाते हैं । इस प्रकार मध्यम के अतिरिक्त किस देव को कहता ॥ "तस्य०" इस ताक्ष्र्य देवकी यह और ऋचा है॥४(२८)॥ व्याख्या । 'देवजूत' शब्द में ' जू ' धातुका गति ( चलना ) अथवा प्रीति अर्थ है । 'सहावानम्' (सहस्वन्तम् ) विशेषण के योग से ताक्ष्र्य देव मध्यम ही हो सकता है । क्योंकि—बलकर्म मध्यम का ही लक्षण है । "तस्य अपरा" 'ताक्ष्र्य' के लिये दूसरे निगम की आवश्यकता इस लियेहुई कि-'ताक्ष्र्य' यह नाम विष्णु भगवान् के वाहन गरुड़ का भी है, और वह भी बलवान् तथा बल- कर्म का करने वाला है, इस कारण वर्ष कर्म को कहने वाली दूसरी ऋचा दी जाती है । वृष्टि कर्म मध्यम का असाधारण लक्षण है ॥ ४ ( २८ ) ॥ ( खं० ५ ) निरु०- सद्यश्चिद्यः शवसा पञ्च कृष्टीः सूर्य इव