निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[Header] हिन्दी निरुक्त ( ३५४ ) १० अ० ३ पा० ५ खं० ज्योतिषा पस्ततान । सहस्रसाः शतसा अस्य रंहि र्न स्म वारन्ते युवतिं न शर्याम् ॥ (ऋ० सं० ८, ८, ३६, ३) सद्योऽपि यः शवसा बलेन तनोति अपः, सूर्य्य इव ज्योतिषा पञ्च मनुष्यजातानि सहस्रसानिनी शतसानिनी अस्य सा गतिः, न स्म एनां वार- यन्ति प्रयुवतीमिव शरमयीमिषुम् । 'मन्युः' मन्यतेर्दीप्तिकर्मणः, क्रोधकर्मणो वध- कर्मणो वा । मन्व॑न्ति अस्माद्-इषवः । तस्यैषा भवति ॥५(२९)॥ अर्थः- "सद्याश्चिद्०" 'यः' जो 'तार्क्ष्यः' तार्क्ष्य देव 'शवसा' (बलेन) बलसे 'पञ्च-कृष्टीः' (पञ्च मनुष्य जातानि) ब्राह्मण आदि पांच वर्णों के प्रति या सब प्राणिमात्र के 'लिये (क्योंकि-इन पांचों के द्वारा और सब प्राणियों का उपकार होजाता है, इससे इनके कथन से मन्त्रमें प्राणिमात्रसे तात्पर्य्य है) "सूर्य्यः इव ज्योतिषा"जिस प्रकार सूर्य्यभगवान् अपनी ज्योति से सब लोक में प्रकाश फैलाते हैं, उसी प्रकार 'अपः' जलों को 'ततान' (तनोति) फैलाता है या बरसता है । 'अस्य' (तार्क्ष्यस्य) इस तार्क्ष्य की 'रंहिः' (सा गतिः) वह गति (बल) 'सहस्रसाः' मेघों के विदारण के अर्थ बहुत प्रकारों को धारण करती है, 'शतसाः' बहुतों से भी बहुत प्रकारों को धारण करती है, (एनाम्) इसको "न (स्म)