भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1119

हिन्दी निरुक्त ( ३५५ ) १० अ० ३ पा० ६ खं०

वरन्ते” ( न केचिद् वारयन्ति ) कोई हटा नहीं सकते या रोक नहीं सकते “युवतिं न शर्याम्” .( प्रयुवतीम् इव शरमयीम् इषुम् ) वेग से अवकाश से अवकाशान्तर में मिलती हुई = तेजी से जाती हुई शर की बनी हुई इषु ( बाण ) के समान् । अर्थात्-बाण की गति के समान उसकी गति को कोई रोक नहीं सकता । ऐसे प्रभाव वाला तार्क्ष्य हमारा यह कल्याण करे, ऐसे प्रार्थना जोड़ लेना चाहिए । 'मन्यु' [१८] (क्रोध) शब्द दीप्ति अर्थ में क्रोध अर्थ में अथवा वध अर्थ में 'मन' [ दि० आ० ] धातुसे है । क्योंकि- 'मन्यन्ति ( मन्यन्ते ) अस्माद् इषवः' इससे बाण प्रकाशित होते हैं = जिसे क्रोध होता है, वही बाण फेंकता है ! “तस्य०” उस मन्यु देव की यह ऋचा है—॥५[२९]॥ ( खं० ६ ) निरु०-“त्वया मन्यो सरथमारुतजन्तौ हर्षमा- णासोऽधृषिता मरुत्वः । तिग्मेषव आयुधा संशि- शाना अभिप्रयन्तु नरो अग्निरूपाः ॥” (ऋ सं० ८,३,१९,१) अ०सं०४,३१,१) त्वया मन्यो सरथम् आरुह्य रुजन्तो हर्षमाणासोऽ धृषिता मरुत्वः तिग्मेषवः आयुधानि संशिशयमानाः अभिप्रयन्तु नरो अग्निरूपाः अग्निकर्माणः संनद्धाः कवचिनः इति वा । दधिक्रा व्याख्यातः, तस्य एषा भवति-॥६(३०)॥