निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३५६ ) १० अ० ३ पा० ७ ख० अर्थ:-“त्वया मन्यो०” यह ऋचा तपस् के पुत्र मन्यु नाम ऋषि की है। श्येनाजिरादिकों में निष्केवल्य में विनि- योग है। 'मन्यो !' हे भगवन् ! मन्युदेव ! 'त्वया' तेरे साथ 'स- रथम्' (आरुह्य) एक रथ में चढ़े कर 'रुजन्तः' (अभिभवन्तः) शत्रुओं को तिरस्कार करते हुए 'हर्षमाणासः' तेरे आश्रय से हर्षित होते हुए 'अधृषिताः' शत्रुओं से न दबे हुए और हे 'मरुत्वः' मरुत्वन् ! वायुदेव ! 'तिग्मेषवः' पैने बाण वाले 'आयुधा' (आयुधानि) आयुधों को 'संशिश्यानाः' भले प्रकार चलाते हुए 'अग्निरूपाः' [अग्निकर्माणः] अग्नि के समान कर्म वाले [सन्नद्धाः] कसे हुए (कवचिनः इति वा) अथवा कवचों को धारण किये हुए 'नरः' ये हमारे योद्धा 'अभिप्रय- न्तु' शत्रुओं के संमुख जावें। 'दधिक्रा' [१६] की व्याख्या [२,७,५] होचुकी, उसकी यह ऋचा है—॥६[३०]॥ [खं०७] निरु०-“आदधिक्राः शवसा पञ्च कृष्टीः सूर्यइव ज्योतिषा परस्ततान। सहस्रसाः शतसा वाज्यर्वा पृणक्तु मध्वा समिमा वचांसि ॥” [ऋ०सं०३, ७, १२, ५]॥ अर्थः-आतनोति दधिक्राः शवसा बलेन अपः सूर्य इव ज्योतिषा पञ्च मनुष्यजातानि सहस्रसाः शतसा 'वाजी' वेजनवान् 'अर्वा' ईरणवान् सं