भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 1121, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1121

पृणक्तु, नो मधुना उदकेन वचनानि इमानि इति । 'मधु' धमतेर्विपरीतस्य । 'सविता' सर्वस्य प्रसविता । तस्य एषा भवति ॥७(३१)॥ अर्थ:- "आदधिक्राः०" इस ऋचा का वामदेव ऋषि है। 'दधिक्राः' दधिक्रा देव 'शवसा' ( बलेन ) बल से 'अपः' जलोंको 'आ—ततान' [ आतनोति ] फैलाता है । कहां ? "पञ्च कृष्टीः" [ पञ्च मनुष्यजातानि ] पांच ब्राह्मण आदि वर्णों के प्रति किसके समान "सूर्य इव ज्योतिषा" जैसे सूर्य भगवान् अपनी ज्योति से सब लोक को व्याप्त करता है । कैसा दधिक्रा देव है ? 'सहस्रसाः' 'शतसाः' बहुत और बहुत से भी बहुत जलों का भजने वाला 'वाजी' [वेजनवान्] शत्रुओं को कंपाने वाला 'अर्वा' [ईरणवान्] जलों की प्रेरणा करने वाला है । सो दधिक्रा देव 'इमा' [इमानि] इन [नः] 'वचांसि' हमारे वचनों को 'मध्वा' ( मधुना ) मिठास से 'सं—पृणक्तु' संयुक्त करे—जलकी वृष्टिसे सफल करे । 'मधु' शब्द आदि अन्त से उलटाए हुए 'धम' [भ्वा०प०] धातु का है । 'सविता' (२०) क्यों सब का प्रसव करने वाला या जनने वाला है । "तस्य ०" उस सविता देव की यह ऋचा है॥ ७ (३१) ॥

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य) · पृष्ठ 1121, कुल 1282 में से · BharatKosha