भारतकोश
संग्रह पर लौटें

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

क्रिया को कर रहा है- जिसकी प्रेरणा से वायुमें चलन(हिल- ना) क्रिया उत्पन्न होती है, और वायु की क्रियासे सब प्राणी या भूत क्रियावान् होजाते हैं, इस प्रकार जो सबका कर्त्ता है- सब की क्रिया शक्ति का आधार है केवल इतनाहीनहीं किन्तु वह 'विमनाः' (विभूतमनाः) सब भूतों की ज्ञानशक्ति का आधार भी है, 'आदुविहायाः ' महान् है, केवल महान् ही नहीं, किन्तु वह 'धाता' अपनी शक्ति विशेष का रचने वाला और उस शक्ति के विषयों का 'विधाता' करने वाला भी है, 'परमः' सबसे ऊंचा है, 'सन्दृक्'(संदर्शयिता) (इन्द्रि- याणाम्) इन्द्रियों में ज्ञान के उत्पन्न करने की शक्ति कोदेने वाला है, क्यों कि- वही विषय (रूप आदि) और विषयि (इन्द्रिय) के सम्बन्ध का करने वाला तथा उन इन्द्रियों में उनके भिन्न २ विषयों के प्रति आलोक (प्रकाश) शक्ति को फैलाने वालो है, 'तेषाम्' उस विश्वकर्मा (परमात्मा)केविभूति रूप उन भूतोंमें जो उसके 'इष्टानि' प्यारे हैं,वे 'इषा' (अन्ने- नसह) अन्न या शक्ति मात्रके सहित 'संमदन्ति' (सम्मॊदन्ते) मोद को प्राप्त होते हैं- तृप्त होते हैं। कहां " यत्रा सप्त ऋषीन् पर एकमाहुः” (यत्र इमानि सप्त ऋषीणांनि इन्द्रियाणि एभ्यः पर आत्मा, तानि एतस्मिन् एकं भवन्ति ) जहां ये सब सप्तऋषीश इन्द्रिये एक होजाती है, इनसे पर (सूक्ष्म या उत्कृष्ट) आत्मा है, उसी में ये एक होती हैं, और वहीं विश्वकर्मा के इष्ट (प्यारे) मोद करते हैं । इस प्रकार यह मन्त्र आत्मा की गति या स्थिति को वर्णन करता है। "तत्र०" इस आत्म गति में आत्मा के जानने वाले

हिन्दी निरुक्त ( ३४८ ) १० अ० ३ पा० ३ खं० इतिहास कहते हैं- विश्वकर्मा भौवन ने सर्वमेध कर्म में सर्व भूतों को होम किया और अन्त में आपे को भी होम कर दिया । जिस अर्थको लेकर "विश्वकर्मा विमनाः०" यह ऋचा आत्मगति से निर्वचन की गई है, उसी इतिहास में वर्णित अर्थ को संमुख भाव से यह ऋचा कहने वाली है । "य इमा विश्वा भुवनानि जुह्वत्०" ( ऋ० सं० ८, ३, १६, १ ) अर्थात्-जिसने इन सब भुवनों (लोकों) को होम किया "तस्य०" उस मन्त्र के बहुत निर्वचन ( व्याख्यान ) के लिये यह अगली ऋचा है ॥२(२६)॥ व्याख्या "विश्वकर्मा" (१६) यह मध्यम लोकका देवता है, जो आदित्यान्तर्वर्ती पुरुष या आदित्यमण्डल के अधिदेवता या हिरण्यगर्भ की अवस्था में एक होता हुआ भी अविद्या या अज्ञान के व्यवधान (परदे) से प्रतिशरीर अलग२ जैसा होते हुआ अपनी विज्ञान शक्ति के द्वारा एक२ शरीर के (प्रत्येक के) अधिकार को अनुभव करता है, और उसके उपासक (भक्त) उसके सायुज्य या सहवास या उसके स्वरूप-प्राप्ति के सुखको भोगते हैं । यह "विश्वकर्मा" इस मन्त्रके अधि- दैवत अर्थ का संक्षेप है । यही अर्थ प्रकरणानुगत है । दूसरा अध्यात्म अर्थ मन्त्र के स्वभावाधीन आचार्य ने दिखाया है, कि-मन्त्रों के इस प्रकार अर्थ भेद भी होते हैं । अध्यात्म अर्थ में 'विश्वकर्मा' परमात्मा है, जो अज्ञान के व्यवधान

हिन्दी निरुक्त ( ३४६ ) १० अ० ३ पा० २ खं० से प्रतिशरीर भिन्न २ जीवात्माओं के रूप में प्रतीत होता है। उसकी उपासना से उसी के स्वरूप को प्राप्त होता है। यही अर्थ भले प्रकार प्रमाणित करने के लिये आचार्य ने यहां विश्वकर्मा भौवन का इतिहास भी दिखाया है, जिस में उस ने सर्वमेध = ज्ञान यज्ञ में सब भूतों को आत्मा में और आत्मा को सब भूतों में होम किया है, अर्थात्- एकात्मभाव जो परमात्मा का रूप है, उसे प्राप्त किया है। इसी इतिहास को प्रमाणित करने के लिये “य इमा विश्वा भुवनानि०” यह ऋचा भी दी है। सर्वमेध। इस शब्द के दो अर्थ हैं। एक में यह यज्ञों के समूह की संज्ञा है। जैसे-तीन (३) अश्वमेध, पांच (५) पुरुषमेध, और दो (२) वाजपेय तथा आप्तोर्याम कुल दश यज्ञों के अनुष्ठान करने से सर्वमेध यज्ञ होजाता है। और दूसरे अर्थ में ज्ञान-यज्ञ से प्रयोजन है। उस में- “यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति। सर्व- भूतेषु चात्मानं ततो न विचिकित्सति” (य०सं० ४०, ६) अर्थात्-जो ज्ञानी पुरुष सब भूतों को अपने में ही देखता है, और सब भूतों में अपने को देखता है, वह फिर सन्देह नहीं करता है, किन्तु परमात्मभाव को प्राप्त होकर नित्यसुख को प्राप्त होजाता है। इस मन्त्रोक्त भावके अनुसार अपने तत्व-ज्ञान की दृष्टि से अपने और सब जगत् के बीच में जो भेद है उसका होम कर देता है। इसी अर्थ को प्रमाणित करने के लिये आचार्य “विश्वकर्मन्०” यह और ऋचा अगले खण्ड में देते हैं।

इतिहास। इतिहास पहिले के बीते हुये वृत्तान्त को कहते हैं, और उसी के ढंग पर मन्त्रों में भी वह जहां तहां आता ही रहता है, किन्तु नित्य वेद में उसका कदापि संभव नहीं, वह यहां अपने आध्यात्मिक, आधिदैविक या आधि- भौतिक किसी अर्थ के प्रतीत होनेके लिये अर्थवाद मात्र होता है। उसका सब प्रकार का अर्थ मन्त्र में अविवक्षित होता है। कल्पित होने से केवल समझने में वह उपयुक्त होता है, फिर उसे छोड़ दिया जाता है,अर्थात्-मन्त्रों में जो इतिहास होता है, वह उसके अर्थको जानने वालोंके लिये उपदेशार्थ होता है, जिसके सहारे पर केवल अर्थ समझ लिया जाता है और फिर वह ग्राह्य नहीं होता ॥ २, (२६) ॥ ( खं० ३ ) निरु०-‘‘ विश्वकर्मन् ह॒विषा॑ वावृधा॒नः स्वयं यजस्व पृथि॒वीमु॒तद्याम् । मुह्यन्त्वन्ये॑ अभि॒तो जना॑स इ॒हास्माकं॑ म॒घवा॑ सू॒रिर॑स्तु ॥ ’’ [ऋ०सं० ६, ३, १६, ६ । य० वा० सं० १७, २२] ॥ विश्वकर्मन् हविषा वर्द्धयमानः स्वयं यजस्व पृथिवीं च दिवं च, मुह्यन्तु अन्ये अभितो जनाः सपत्नाः,इह अस्माकं मघवासूरिः-अस्तु प्रज्ञाता “तार्क्ष्यः”त्वष्ट्रा व्याख्यातःतीर्णोऽन्तरिक्षे क्षियति तूर्णम्-अर्थ रक्षति । अश्नोतेर्वा । तस्य एषा भवति- ॥ ३ ( २७ ) ॥

हिन्दी निरुक्त ( ३५१ ) १० अ० ३ पा० ३ खं० अर्थ :— “विश्वकर्मन्०” विश्वकर्मा की प्रयोगावस्था और फलावस्था दोनोंको देखकर ऋषि कहता है—हे 'विश्व- कर्मन् !' प्रयोग या यज्ञमें अवस्थित = संयुक्त' देव' 'हविषा' इस सर्वमेध की दर्शन-( ज्ञान ) सम्पत्ति से युक्त हविः से 'वावृधानः' (वर्द्धयमानः) बढ़ते हुये 'त्वम्' तुम 'स्वयम्' और उस (यज्ञ) के फलपाक के समय 'पृथिवीम्' पृथ्वी को 'उत- द्याम्' और द्युलोक को 'यजस्व' (व्याप्नुहि) व्यापन करना- हमारे यज्ञके फल देने के समय तुम सब विश्व में फैलजाना, जिससे कि कहीं भी हमें फल भोगने में त्रुटि न हो, अथवा अपने पूर्णरूप से पूर्णसामर्थ्य से हमें पूर्ण फल देना । 'अन्ये' ( सपत्नाः ) और तेरी भक्ति से विमुख शत्रु 'जनासः' जन 'अभितः' ( सर्वतः ) सब ओर से 'मुह्यन्तु' मोहित होवें । 'इह' तेरे इस दर्शनरूप उपासनो कर्म में 'अस्माकम्' हमारा 'सूरिः' ( प्रज्ञाता ) जानने वाला 'मघवा' ( इन्द्रः ) इन्द्रदेव 'अस्तु' होवे । 'तार्क्ष्य' ( ७) शब्द 'त्वष्टृ' शब्द (२,७,६) से व्याख्यात है उसके समान ही इसकी व्याख्या है। जैसे- “तूर्णम् अश्नुते” 'शीघ्र व्यापन करता है' इत्यादि । अथवा ‘तीर्णे अन्तरिक्षे क्षियति' फैले हुए आकाश में निवास करता है, इस लिये 'तार्क्ष्य' है। अथवा तूर्ण (शीघ्र) अर्थ की रक्षा करता है, इससे 'तार्क्ष्य' है । अथवा व्याप्ति अर्थ में 'अश' (स्वा०आ०) धातु से है। क्योंकि वह व्यापन कर लेता है। यहां 'तूर्ण' शब्द से' पूर्वपद ( तार् ) और 'रक्ष' या 'अश' धातु से उत्तरपद 'क्ष्य होता है। “तस्य०” उस 'तार्क्ष्य' देव की यह ऋचा है—॥३(२७)॥

हिन्दी निरुक्त ( ३५२ ) १० अ० ३ पा० ४ खं० व्याख्या । पौराणिक या पुराण वेत्ता मानते हैं कि—'विश्वकर्मा', नाम देवशिल्पी या देवताओं के खाती (बढ़ई) का है । उन के मत में भी 'विश्वकर्म' शब्द का स्वाभाविक अर्थ लेने के लिये कलाकौशल विषयक सर्वज्ञता लीजासकती है। यथासंभव शब्द की शक्ति को घटा लेना या संगत कर लेना चाहिये यही निरुक्त शास्त्र का अभिप्राय है ॥३(२७)॥ (खं० ४) निरु०-“त्यमूषु वाजिनं देवजूतं सहावानं तरु- तारं रथानाम् । अरिष्टनेमिं पृतनाजमाशुं स्व- स्तये तार्क्ष्य मिहा हुयेम ॥”[ऋ०सं०८,८,३६,१ । सा० सं० छ०आ० ४,१,५,१] ॥ तं भृशम् अन्नवन्तम् । 'जूति'र्गतिः प्रीति र्वा। 'देवजूतं' देवगतं देवप्रीतं वा । सहस्वन्तं तारयि- तारं रथानाम्, अरिष्टनेमिं पृतनाजितम् आशुं स्वस्तये तार्क्ष्यम्- इह हुयेम- इति कम्- अद्यं मध्यमाद्- एवम् अवक्ष्यत् ॥ तस्य एषा अपरा भवति ॥४(२८)॥ अर्थः- “त्यमूषु०” इस ऋचा का अरिष्टनेमि ऋषि है, विषुवत् के निष्केवल्य मे शस्त्र है । 'त्यम्' (तम्) उस 'वाजिनम्' (भृशम् अन्नवन्तम्) अति- शय अन्नवाले देवजूतम्' ( देवगतम् ) देवताओं से बड़े माने

हुये (देवप्रीतं वा) अथवा देवताओं के साथ समान भाव से प्याररखनेवाले। 'सहावानम्' (सहस्वन्तम्) बल वाले 'रथानाम्' रंहण करने वाले या चलने वाले सब प्राणियों के 'तरुतारम्' (तारयितारम्) चलाने वाले 'अरिष्टनेमिम्' किसी से भी न रुकने वाले वज्र के धारण करने वाले 'पृतनाजितम्' (पृतनाजितम् ) शत्रुओं की सेनाओं को जीतने वाले 'आशुम्' शीघ्र गमन वाले 'ताक्ष्र्यम्' ताक्ष्र्य देवको (वयम्) हम 'इह' यहां अपने यज्ञ मे 'स्वस्तये' कल्याण के अर्थ 'हुवेम' (ह्वयेम) बुलाते हैं । इस प्रकार मध्यम के अतिरिक्त किस देव को कहता ॥ "तस्य०" इस ताक्ष्र्य देवकी यह और ऋचा है॥४(२८)॥ व्याख्या । 'देवजूत' शब्द में ' जू ' धातुका गति ( चलना ) अथवा प्रीति अर्थ है । 'सहावानम्' (सहस्वन्तम् ) विशेषण के योग से ताक्ष्र्य देव मध्यम ही हो सकता है । क्योंकि—बलकर्म मध्यम का ही लक्षण है । "तस्य अपरा" 'ताक्ष्र्य' के लिये दूसरे निगम की आवश्यकता इस लियेहुई कि-'ताक्ष्र्य' यह नाम विष्णु भगवान् के वाहन गरुड़ का भी है, और वह भी बलवान् तथा बल- कर्म का करने वाला है, इस कारण वर्ष कर्म को कहने वाली दूसरी ऋचा दी जाती है । वृष्टि कर्म मध्यम का असाधारण लक्षण है ॥ ४ ( २८ ) ॥ ( खं० ५ ) निरु०- सद्यश्चिद्यः शवसा पञ्च कृष्टीः सूर्य इव

[Header] हिन्दी निरुक्त ( ३५४ ) १० अ० ३ पा० ५ खं० ज्योतिषा पस्ततान । सहस्रसाः शतसा अस्य रंहि र्न स्म वारन्ते युवतिं न शर्याम् ॥ (ऋ० सं० ८, ८, ३६, ३) सद्योऽपि यः शवसा बलेन तनोति अपः, सूर्य्य इव ज्योतिषा पञ्च मनुष्यजातानि सहस्रसानिनी शतसानिनी अस्य सा गतिः, न स्म एनां वार- यन्ति प्रयुवतीमिव शरमयीमिषुम् । 'मन्युः' मन्यतेर्दीप्तिकर्मणः, क्रोधकर्मणो वध- कर्मणो वा । मन्व॑न्ति अस्माद्-इषवः । तस्यैषा भवति ॥५(२९)॥ अर्थः- "सद्याश्चिद्०" 'यः' जो 'तार्क्ष्यः' तार्क्ष्य देव 'शवसा' (बलेन) बलसे 'पञ्च-कृष्टीः' (पञ्च मनुष्य जातानि) ब्राह्मण आदि पांच वर्णों के प्रति या सब प्राणिमात्र के 'लिये (क्योंकि-इन पांचों के द्वारा और सब प्राणियों का उपकार होजाता है, इससे इनके कथन से मन्त्रमें प्राणिमात्रसे तात्पर्य्य है) "सूर्य्यः इव ज्योतिषा"जिस प्रकार सूर्य्यभगवान् अपनी ज्योति से सब लोक में प्रकाश फैलाते हैं, उसी प्रकार 'अपः' जलों को 'ततान' (तनोति) फैलाता है या बरसता है । 'अस्य' (तार्क्ष्यस्य) इस तार्क्ष्य की 'रंहिः' (सा गतिः) वह गति (बल) 'सहस्रसाः' मेघों के विदारण के अर्थ बहुत प्रकारों को धारण करती है, 'शतसाः' बहुतों से भी बहुत प्रकारों को धारण करती है, (एनाम्) इसको "न (स्म)

हिन्दी निरुक्त ( ३५५ ) १० अ० ३ पा० ६ खं०

वरन्ते” ( न केचिद् वारयन्ति ) कोई हटा नहीं सकते या रोक नहीं सकते “युवतिं न शर्याम्” .( प्रयुवतीम् इव शरमयीम् इषुम् ) वेग से अवकाश से अवकाशान्तर में मिलती हुई = तेजी से जाती हुई शर की बनी हुई इषु ( बाण ) के समान् । अर्थात्-बाण की गति के समान उसकी गति को कोई रोक नहीं सकता । ऐसे प्रभाव वाला तार्क्ष्य हमारा यह कल्याण करे, ऐसे प्रार्थना जोड़ लेना चाहिए । 'मन्यु' [१८] (क्रोध) शब्द दीप्ति अर्थ में क्रोध अर्थ में अथवा वध अर्थ में 'मन' [ दि० आ० ] धातुसे है । क्योंकि- 'मन्यन्ति ( मन्यन्ते ) अस्माद् इषवः' इससे बाण प्रकाशित होते हैं = जिसे क्रोध होता है, वही बाण फेंकता है ! “तस्य०” उस मन्यु देव की यह ऋचा है—॥५[२९]॥ ( खं० ६ ) निरु०-“त्वया मन्यो सरथमारुतजन्तौ हर्षमा- णासोऽधृषिता मरुत्वः । तिग्मेषव आयुधा संशि- शाना अभिप्रयन्तु नरो अग्निरूपाः ॥” (ऋ सं० ८,३,१९,१) अ०सं०४,३१,१) त्वया मन्यो सरथम् आरुह्य रुजन्तो हर्षमाणासोऽ धृषिता मरुत्वः तिग्मेषवः आयुधानि संशिशयमानाः अभिप्रयन्तु नरो अग्निरूपाः अग्निकर्माणः संनद्धाः कवचिनः इति वा । दधिक्रा व्याख्यातः, तस्य एषा भवति-॥६(३०)॥

हिन्दी निरुक्त ( ३५६ ) १० अ० ३ पा० ७ ख० अर्थ:-“त्वया मन्यो०” यह ऋचा तपस् के पुत्र मन्यु नाम ऋषि की है। श्येनाजिरादिकों में निष्केवल्य में विनि- योग है। 'मन्यो !' हे भगवन् ! मन्युदेव ! 'त्वया' तेरे साथ 'स- रथम्' (आरुह्य) एक रथ में चढ़े कर 'रुजन्तः' (अभिभवन्तः) शत्रुओं को तिरस्कार करते हुए 'हर्षमाणासः' तेरे आश्रय से हर्षित होते हुए 'अधृषिताः' शत्रुओं से न दबे हुए और हे 'मरुत्वः' मरुत्वन् ! वायुदेव ! 'तिग्मेषवः' पैने बाण वाले 'आयुधा' (आयुधानि) आयुधों को 'संशिश्यानाः' भले प्रकार चलाते हुए 'अग्निरूपाः' [अग्निकर्माणः] अग्नि के समान कर्म वाले [सन्नद्धाः] कसे हुए (कवचिनः इति वा) अथवा कवचों को धारण किये हुए 'नरः' ये हमारे योद्धा 'अभिप्रय- न्तु' शत्रुओं के संमुख जावें। 'दधिक्रा' [१६] की व्याख्या [२,७,५] होचुकी, उसकी यह ऋचा है—॥६[३०]॥ [खं०७] निरु०-“आदधिक्राः शवसा पञ्च कृष्टीः सूर्यइव ज्योतिषा परस्ततान। सहस्रसाः शतसा वाज्यर्वा पृणक्तु मध्वा समिमा वचांसि ॥” [ऋ०सं०३, ७, १२, ५]॥ अर्थः-आतनोति दधिक्राः शवसा बलेन अपः सूर्य इव ज्योतिषा पञ्च मनुष्यजातानि सहस्रसाः शतसा 'वाजी' वेजनवान् 'अर्वा' ईरणवान् सं

पृणक्तु, नो मधुना उदकेन वचनानि इमानि इति । 'मधु' धमतेर्विपरीतस्य । 'सविता' सर्वस्य प्रसविता । तस्य एषा भवति ॥७(३१)॥ अर्थ:- "आदधिक्राः०" इस ऋचा का वामदेव ऋषि है। 'दधिक्राः' दधिक्रा देव 'शवसा' ( बलेन ) बल से 'अपः' जलोंको 'आ—ततान' [ आतनोति ] फैलाता है । कहां ? "पञ्च कृष्टीः" [ पञ्च मनुष्यजातानि ] पांच ब्राह्मण आदि वर्णों के प्रति किसके समान "सूर्य इव ज्योतिषा" जैसे सूर्य भगवान् अपनी ज्योति से सब लोक को व्याप्त करता है । कैसा दधिक्रा देव है ? 'सहस्रसाः' 'शतसाः' बहुत और बहुत से भी बहुत जलों का भजने वाला 'वाजी' [वेजनवान्] शत्रुओं को कंपाने वाला 'अर्वा' [ईरणवान्] जलों की प्रेरणा करने वाला है । सो दधिक्रा देव 'इमा' [इमानि] इन [नः] 'वचांसि' हमारे वचनों को 'मध्वा' ( मधुना ) मिठास से 'सं—पृणक्तु' संयुक्त करे—जलकी वृष्टिसे सफल करे । 'मधु' शब्द आदि अन्त से उलटाए हुए 'धम' [भ्वा०प०] धातु का है । 'सविता' (२०) क्यों सब का प्रसव करने वाला या जनने वाला है । "तस्य ०" उस सविता देव की यह ऋचा है॥ ७ (३१) ॥

हिन्दी निरुक्त ( ३५८ ) १० अ० ३ पा० ८ ० खं० ( खं० ८ ) निरु०-“सविता यन्त्रैः पृथिवी मरम्णा दस्क- म्भने सविता द्यामहंहत् । अश्वमिवाधुक्षद्धुनिम- न्तरिक्षमतूर्त्ते बद्धं सविता समुद्रम् ॥” [ ऋ०सं० ८, ८, ७, १ ] ॥ सविता यन्त्रैः पृथिवीम् अरमयत् । अनारम्भ- णे अन्तरिक्षे सविता द्याम् अहंहत् । अश्वम्-इव अधुक्षत् धुनिम्- अन्तरिक्षमेघम्, बद्धम्-अतूर्ते = बद्धम्-अतूर्णे इति वा, अत्वरमाणे इति वा। सविता समुदितारम्-इति कम्-अन्यं मध्यमाद् एवम् अवक्ष्यत् ॥ आदित्योऽपि ‘सविता’ उच्यते । तथाच हैर- ण्यस्तूपे स्तुतः अर्चन्न् हिरण्यस्तूप ऋषिः इदं सूक्तं प्रोवाच । तदभिवादिनी एषा ऋग् भवति-॥८ ( ३२ ) अर्थः--“सविता यन्त्रैः ”इस ऋचा का अर्चन्नामा हैरण्यस्तूप ऋषि है । 'सविता' मध्यम देव सब बलों के स्वामी सविताने 'यन्त्रैः' यन्त्रोंके द्वारा 'पृथिवीम्' पृथ्वीको 'अरम्णात्' थांमा या रोका । (अन्यथा यह ऐसी निश्चल न रहती ।) सविता' सविता ही ने 'अस्कम्भने' (अनारम्भणे अन्तरिक्षे) अमूर्त्त

हिन्दी निरुक्त ( ३५६ ) १० अ० ३ पा० ६ खं० ( पतले ) आकाश में जहां पंत्तां भी नहीं ठहर सकता 'द्याम्' द्यौ (द्युलोक) को स्थिर किया और भी 'सविता' सविता देव ने 'अतूर्त्तं' । (अतूर्णे इति वा) (अत्वरमाणो वा) अंचल 'अन्तरिक्षम्' । (अन्तरिक्षे) आकाश में बद्धम्' बंधे हुए 'समुदितारम्' समय पर उदय होने वाले 'धुनिम्' मेघ को 'अश्वम्-इव' घोड़े के समान 'अधुक्षत्' झाड़ दिया- जिस प्रकार कोई घोड़े को रखने वाला उससे धूली दूर करने के लिये उसको सहज में कम्पित कर देता है उसी प्रकार सविता देव जल के गिराने के अर्थ मेघ को कम्पित कर देते हैं [ भाष्यकार कहते हैं कि- ] मध्यम के अतिरिक्त इस प्रकार और किस देव को ऐसे कहता [ सर्वथा यह सविता मध्यम लोक का देव ही है ] । आदित्य भी 'सविता' कहलाता है । वैसे ही (जिस प्रकार कि- सविता आदित्य है) हिरण्यस्तूप सूक्त में स्तुति किये गये अर्चन् हिरण्यस्तूप ऋषि ने इस सूक्त को बोला था “तदभि वादिनी०” उसी को कहने वाली यह ऋचा है-॥ ८ (३२) ॥ ( खं० ६ ) निरु०- “हिरण्यस्तूपः सवितर्यथा त्वाङ्गिरसो जुह्वे वाजेअस्मिन् । एवात्वार्चन्नवसे वन्दमानः सोमस्येवांशं प्रति जागराहम ॥” (ऋ० सं० ८, ८, ७, ५) ॥ 'हिरण्यस्तूपः' हिरण्यमयस्तूपः । हिरण्यमयः स्तूपोऽस्य - इति वा ।

हिन्दी निरुक्त ( ३६० ) १० अ० ३ पा० १० खंड 'स्तूपः' स्त्यायतेः। सङ्घातः । सवितः !.यथा त्वा आङ्गिरसः जुह्वे, वाजे अन्ने अस्मिन्, एवं त्वा अर्चन्अवनाय वन्दमानः सोमस्यऽइव अंशुं प्रति जागर्मि अहम् । 'त्वष्टा' व्याख्यातः,तस्य-एषा भवति ॥९(३३)॥ अर्थ:-“ हिरण्यस्तूपः” इस ऋचा का अर्चन् नामक हिरण्यस्तूप ऋषि है। हे 'सवितः' 'यथा' जिस प्रकार दूसरे कल्प के 'आङ्गिरसः' अङ्गिरस् के पुत्र हिरण्यस्तूप ऋषि ने 'त्वा'तुझे 'जुह्वे' [आजु- हाव] आवाहन किया 'एवा' वैसे ही ' अस्मिन् ' इस 'वाजे' [संस्कृते हविषि] बनाये हुये हविः में 'अहम्' मैं इस कल्प का 'अर्चन्' अर्चन् नामा हिरण्यस्तूप ऋषि 'अवसे' (अवनाय) रक्षा के लिये 'त्वा' तुझे ' वन्दमानः' वन्दना करता हुआ सोमस्य- इव अंशुम् सोम के अंशु [ रस ] को खरीद कर जैसे 'प्रतिजगरा' [जागर्मि]जागता हूं- यज्ञ पर्यन्त तेरी उपासना करता हूं ॥ 'हिरण्यस्तूप' क्या ? हिरण्य (सुवर्ण) का स्तूप (समूह) अथवा हिरण्यमय (सुवर्ण का) स्तूप (कीर्त्ति स्तम्भ) जिसका हो वह हिरण्यस्तूप है । 'स्तूप' किस धातु से है ? संघात अर्थ में 'स्त्यै[वा०प०] धातु से ।क्या ? संघात । 'त्वष्टा' (२१)शब्द की व्याख्या[२,७,५] हो चुकी । उस की यह ऋचा है ॥६(३३)॥

हिन्दी निरुक्त ( ३६१ ) १० अ० ३ पा० १० खं० खं० १० निरु०-“देवस्त्वष्टा सविता विश्वरूपः पुपोष प्रजाः पुरुधा जजान। इमा च विश्वा भुवनान्यस्य मह- द्देवाना मसुरत्वमेकम् ॥” (ऋ०सं०३,३,३१,४) ॥ देवः त्वष्टा सविता सर्वरूपः पोषति प्रजाःरसानु- प्रदानेन बहुधा च इमा जनयति, इमानि च सर्वाणि भूतानि उदकानि अस्य महञ्च अस्मै देवानाम् असुरत्वम् एकं प्रज्ञावत्वं वा, अनवत्वं वा । अपि वा'असुः'इति प्रज्ञानाम। अस्यति अनर्थान् अस्ताश्च अस्याम् अर्थाः । असुरत्वम् आदिलुप्तम् 'वातः' (२३) वाति इति सतः । तस्य एषा भवति- ॥ १० ( ३४ ) ॥ अर्थः-“देवस्त्वष्टा०” यह विश्वामित्र के पुत्र प्रजा- पति ॠषि की है। वैश्वदेव में विनियोग है । ‘त्वष्टा-देवः’ त्वष्टा मध्यम देव ‘विश्वरूपः’ (सर्वरूपः) सर्वरूप ‘सविता’ सब भूतों का उत्पन्न करने वाला है। और उत्पन्न करके ‘प्रजाः’ सब प्रजा- ओं को (रसानुप्रदानेन) जल के दान से ‘पुपोष’ (पोषति) पोषण करता है । केवल इतना ही नहीं-‘पुरुधा’ (बहुधाच) और बहुत प्रकार से (इमाः) इन प्रजाओं को ‘जजान’(जनय- =वर्द्धयति) बढाता है। क्यों कि-इमां (इमानि) ‘च’ और ये ‘विश्वा’ (सर्वाणि) सब ‘भुवनानि’ (भूतानि = उदका-

हिन्दी निरुक्त ( ३६२ ) १० अ० ३पा० १० खं० नि) भूत या जल 'अस्य' इसके हैं । (इसी से सब को उत्पन्न करता है, पोषण करता है, और बढाता है ।) 'महत्' (च) और इससे भी किं—'महत्' बड़ा या पूजनीय 'देवानाम्' देव- ताओं का 'एकम्' एक या असाधारण 'असुरत्वम्'असुरत्व = प्रज्ञावत्व है । (उस महती प्रज्ञा और जल रूप साधनसे वह जगत्की उत्पत्ति पालन और वृद्धि करता है । क्योंकि—साधन होने पर भी निर्बुद्धि पुरुष कुछ नहीं कर सकता) अथवा 'असुरत्वम्' (अनवत्वम्) असुरत्व = प्राणवत्व है । ( क्यों कि- प्राणवान् ही सब कुछ कर सकता है निष्प्राण का कुछ शक्य नहीं) कोई 'असुरत्व' का अन्नवत्त्व अर्थ करते हैं। उनके मत में अन्न का कारण जल है, और देवता जलवाले हैं, इस प्रकार वे अन्न वाले होते हैं ॥ 'असुरत्व' क्या ? 'असु' यह प्रज्ञा या तीखी बुद्धि का नाम है । क्यों कि— "अस्यति अनर्थान्" वह अनर्थों को असन करती है- दूर हटाती है । अथवा इसमें सब अर्थ अस्त हैं, इसी से संसार के सब कार्य सिद्ध होते हैं। और 'असु (प्रज्ञा) जिसमें हो, वह 'असुर' होता है । यहां 'असु' शब्द से 'र'प्रत्यय होता है । इसी असुर शब्द के आदि अक्षर कालोप होने से 'सुर' शब्द बन जाता है, जो कि— लोक में भी प्रसि- द्ध है । और 'असुर शब्द से भाव प्रत्यय 'त्व' होने से 'असु- रत्व' होता है । असुरत्व = असुरपना ॥ 'वात' (२२) (वायु) कैसे ? 'वाति' (चलता है) इस कर्त्तृवाच्य गत्यर्थक 'वा'[अदा०प०]धातु से है । "तस्य०" उस 'वातमध्यम देवकी यह ऋचा है॥१०(३४)॥

हिन्दी निरुक्त (३६३) १० अ० ३ पा० ११ख०


(खं० ११) निरु०- “वात आवातु भेषजं शम्भु मयोभु नो हृदे । प्रण आयूँषि तारिषत् ॥” [ऋ० सं० ८,८, ५४, १ । सा० सं० छ० आ० २,२, ४, १० ] वात आवातु भेषज्यानि शम्भु मयोभु च नो हृदयाय प्रवर्द्धयतु च नः आयुः । ‘अग्निः’ व्याख्यातः । तस्य एषा भवति ॥११(३५) ॥ अर्थः-“वात आवातु०” इस ऋचा का उल्लव वाता- यन ऋषि है। ‘वात:’ पवन देव ‘भेषजम्’ [भैषज्यानि] जो जो हमारे लिये पथ्य हो, उसे ‘आवातु’ हमारे सामने लावे ‘शम्भु’ और वह हमारे लिये सुखकारी हो तथा ‘हृदे’ हमारे हृदय के लिये ‘मयोभु’ सुख दायक हो, ‘नः’ [ अस्माकम् ] हमारी ‘आयूंषि’ आयु को प्रतारिषत्’ [ प्रवर्द्धयतु] बढावे । ‘अग्नि’ (१३) शब्द की व्याख्या [ ७, ४, १ ] की जाचुकी है । “तस्य०” उसकी यह ऋचा है ॥११(३५)॥ व्याख्या । “वात आवातु०” इस मन्त्र में वायु देवकी प्रार्थना से स्पष्ट कहा गया है कि- शुद्ध वायु से शरीर में नैरोग्य आयु की वृद्धि और हृदय की पुष्टि अतएव ज्ञान की वृद्धि होती है तथा शुद्ध वायु ही प्रधान पथ्य है ॥११(३५) (खंड १२) निरु०-“प्रति त्यं चारु मध्वरं गोपीथाय प्रहूय*

से । मरुद्भिरग्न आगहि ॥” [ऋ०सं०१,१,३६,१ । सा०सं० छ०आ० १,१, २,६] ॥ तं प्रति चारुम् अध्वरं सोमपानाय प्रहूयसे सो ऽग्ने मरुद्भिः सह आगच्छ इति कम् अन्यं मध्यमाद्-एवम् अवक्ष्यत् । तस्य एषा भवति ॥ १२ (३६) ॥ अर्थः— “प्रति त्यम्” इस ऋचाका मेधातिथि ऋषि है। ‘अग्ने’! हे भगवन् ! अग्नि देव ! ‘ त्यम् ’ ( तम् ) उस ‘चारुम्’ (अङ्गवैकल्यरहितम्) अङ्ग की विकलता ( हीनता ) से रहित या सुन्दर ‘अध्वरम्’ ‘प्रति’ यज्ञ के प्रति ( त्वम् ) तू ‘गींपीथाय’ (सोमपानाय) सोमपान के लिये ‘प्रहूयसे’ बुलाया जाता है, (स त्वम्) सो तू यह जान कर ‘मरुद्भिः’ मरुतों के साथ ‘आगहि’ (आगच्छ) आ । इस प्रकार मध्यम के अति- रिक्त किसे कहता (अतः ‘अग्नि’ शब्द से यहां मध्यम ही है किन्तु पार्थिव नहीं ।) “तस्य०” उसकी यह दूसरी ऋचा है -- ॥ १२ ( ३६ ) ॥ ( खं० १३ ) निरु०-“अभि त्वा पूर्वपीतये सृजामि सोम्यं मधु । मरुद्भि रग्न आगहि॥”[ऋ०सं०१,१,३७,४। सा० सं० छ० आ० ३, २,२,४]॥ अभिमृजामि त्वा पूर्वपीतये पूर्वपानाय सोम्यं मधु सोममयं सः अग्ने मरुद्भिः सह आगच्छ । इति ॥१३ (३७) ॥ इति दशमाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥१०, ३॥

हिन्दी निरुक्त ( ३६५ ) १० अ० ४ पा० १ खं० अर्थ :- “अभित्वा०” इस ऋचाका मेधातिथि ऋषि है 'अग्ने ! ' हे भगवन् ! अग्नि देव ! 'त्वा' - तुझे 'पूर्वपीतये' (पूर्व-पानाय) प्रथम पान के अर्थ 'अभि-सृजामि (वदामि) कहता हूं कि 'सोम्यम्' यह सोमरूप 'मधु' मिठाई है,' (सः) सो तू 'मरुद्भिः (सह) मरुतों के साथ 'आगहि' (आगच्छ) आ-यह हम चाहते हैं ॥ १३ (३७) ॥ इति हिन्दीनिरुक्ते दशमाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥१०,३॥ चतुर्थः पादः निघ०-वेनः ॥२४॥ असुनीतिः ॥२५॥ ऋतः ॥२६॥ इन्दुः ॥२७॥ प्रजापतिः ॥२८॥ अहिः ॥२६॥ अहिर्बुध्न्यः ॥३०॥ सुपर्णः ॥३१॥ पुरूरवाः ॥ ३२ ॥ इति द्वात्रिंशत् (३२) पदानि ॥४॥ (खं० १) निरु०-'वेनः' वेनतेः कान्तिकर्मणः । तस्य एषा भवति ॥१(३८)॥ अर्थः- 'वेन' (२४) कान्ति अर्थ में 'वेन' (भ्वा०प०) धातु का है । क्योंकि-मध्यम देव सब लोक का प्यारा है, जिससे कि वह सबका उपकारी है । “तस्य०” उस वेन देव की यह ऋचा है-॥१(३८)॥ (खं० २) निरु०-“अयं वेनश्चोदयत् पृश्निगर्भा ज्योति-

[Header] हिन्दी निरुक्त (३६६) , १० अ० ४ पा० २ खं०

जरायु॒ रज॑सो वि॒माने॑ । इ॒मम॒पां स॒ङ्गमे॒ सूर्य॑स्य शिशुं॒ न विप्रा॑ म॒तिभी॑रिहन्ति ॥” [ ऋ०सं० ८, ७,७,१ । य०वा०सं०७,१६] ॥ अयं वेनः चोदयत् ‘पृश्निगर्भाः’ प्राष्टवर्णगर्भाः आपः इति वा । ‘ज्योतिर्जरायुः’ ज्योतिः अस्य जरायुस्थानीयं भवति । ‘जरायुः’ जरया गर्भस्य, जरया यूयत इति वा । इमम् अपां च सङ्गमे सूर्य्यस्य च शिशुम्-इव विप्रा मतिभिः—रिहन्ति लिहन्ति, स्तुवन्ति, वर्द्धयन्ति, पूजयन्ति इति वा । ‘शिशुः’ शंसनीयो भवति । शिशीतेर्वा स्याद् दानकर्मणः । “चिरलब्धो गर्भः” इति । ‘असुनीतिः’ असून् नयति । तस्य एषा भवति-॥९(३९)॥ अर्थः-“अयं वेनः०” इस ऋचा का भार्गव वेन ऋषि है । इस ऋचा से शुक्र का ग्रहण होता है । भार्गव वेन अपनी समाधि में देवता का साक्षात्कार करता हुआ प्रत्यक्ष देवता को दिखाता हुआ जैसा किसी से कहता है । ‘अयम्’ यह ‘वेनः’ वेन देव, ‘ज्योतिर्जरायुः’ जिसका ज्योतिः या बिजली ही जरायु = जेर = गर्भ की कांचली है, अथवा जो अपनी ज्योतिः से गर्भ की जरा (जेर) के समान (यु) मिलाहुआ या लिपटा हुआ है “रजसः-विमाने”