निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 1123, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३५६ ) १० अ० ३ पा० ६ खं० ( पतले ) आकाश में जहां पंत्तां भी नहीं ठहर सकता 'द्याम्' द्यौ (द्युलोक) को स्थिर किया और भी 'सविता' सविता देव ने 'अतूर्त्तं' । (अतूर्णे इति वा) (अत्वरमाणो वा) अंचल 'अन्तरिक्षम्' । (अन्तरिक्षे) आकाश में बद्धम्' बंधे हुए 'समुदितारम्' समय पर उदय होने वाले 'धुनिम्' मेघ को 'अश्वम्-इव' घोड़े के समान 'अधुक्षत्' झाड़ दिया- जिस प्रकार कोई घोड़े को रखने वाला उससे धूली दूर करने के लिये उसको सहज में कम्पित कर देता है उसी प्रकार सविता देव जल के गिराने के अर्थ मेघ को कम्पित कर देते हैं [ भाष्यकार कहते हैं कि- ] मध्यम के अतिरिक्त इस प्रकार और किस देव को ऐसे कहता [ सर्वथा यह सविता मध्यम लोक का देव ही है ] । आदित्य भी 'सविता' कहलाता है । वैसे ही (जिस प्रकार कि- सविता आदित्य है) हिरण्यस्तूप सूक्त में स्तुति किये गये अर्चन् हिरण्यस्तूप ऋषि ने इस सूक्त को बोला था “तदभि वादिनी०” उसी को कहने वाली यह ऋचा है-॥ ८ (३२) ॥ ( खं० ६ ) निरु०- “हिरण्यस्तूपः सवितर्यथा त्वाङ्गिरसो जुह्वे वाजेअस्मिन् । एवात्वार्चन्नवसे वन्दमानः सोमस्येवांशं प्रति जागराहम ॥” (ऋ० सं० ८, ८, ७, ५) ॥ 'हिरण्यस्तूपः' हिरण्यमयस्तूपः । हिरण्यमयः स्तूपोऽस्य - इति वा ।