भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1124

हिन्दी निरुक्त ( ३६० ) १० अ० ३ पा० १० खंड 'स्तूपः' स्त्यायतेः। सङ्घातः । सवितः !.यथा त्वा आङ्गिरसः जुह्वे, वाजे अन्ने अस्मिन्, एवं त्वा अर्चन्अवनाय वन्दमानः सोमस्यऽइव अंशुं प्रति जागर्मि अहम् । 'त्वष्टा' व्याख्यातः,तस्य-एषा भवति ॥९(३३)॥ अर्थ:-“ हिरण्यस्तूपः” इस ऋचा का अर्चन् नामक हिरण्यस्तूप ऋषि है। हे 'सवितः' 'यथा' जिस प्रकार दूसरे कल्प के 'आङ्गिरसः' अङ्गिरस् के पुत्र हिरण्यस्तूप ऋषि ने 'त्वा'तुझे 'जुह्वे' [आजु- हाव] आवाहन किया 'एवा' वैसे ही ' अस्मिन् ' इस 'वाजे' [संस्कृते हविषि] बनाये हुये हविः में 'अहम्' मैं इस कल्प का 'अर्चन्' अर्चन् नामा हिरण्यस्तूप ऋषि 'अवसे' (अवनाय) रक्षा के लिये 'त्वा' तुझे ' वन्दमानः' वन्दना करता हुआ सोमस्य- इव अंशुम् सोम के अंशु [ रस ] को खरीद कर जैसे 'प्रतिजगरा' [जागर्मि]जागता हूं- यज्ञ पर्यन्त तेरी उपासना करता हूं ॥ 'हिरण्यस्तूप' क्या ? हिरण्य (सुवर्ण) का स्तूप (समूह) अथवा हिरण्यमय (सुवर्ण का) स्तूप (कीर्त्ति स्तम्भ) जिसका हो वह हिरण्यस्तूप है । 'स्तूप' किस धातु से है ? संघात अर्थ में 'स्त्यै[वा०प०] धातु से ।क्या ? संघात । 'त्वष्टा' (२१)शब्द की व्याख्या[२,७,५] हो चुकी । उस की यह ऋचा है ॥६(३३)॥