निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३६५ ) १० अ० ४ पा० १ खं० अर्थ :- “अभित्वा०” इस ऋचाका मेधातिथि ऋषि है 'अग्ने ! ' हे भगवन् ! अग्नि देव ! 'त्वा' - तुझे 'पूर्वपीतये' (पूर्व-पानाय) प्रथम पान के अर्थ 'अभि-सृजामि (वदामि) कहता हूं कि 'सोम्यम्' यह सोमरूप 'मधु' मिठाई है,' (सः) सो तू 'मरुद्भिः (सह) मरुतों के साथ 'आगहि' (आगच्छ) आ-यह हम चाहते हैं ॥ १३ (३७) ॥ इति हिन्दीनिरुक्ते दशमाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥१०,३॥ चतुर्थः पादः निघ०-वेनः ॥२४॥ असुनीतिः ॥२५॥ ऋतः ॥२६॥ इन्दुः ॥२७॥ प्रजापतिः ॥२८॥ अहिः ॥२६॥ अहिर्बुध्न्यः ॥३०॥ सुपर्णः ॥३१॥ पुरूरवाः ॥ ३२ ॥ इति द्वात्रिंशत् (३२) पदानि ॥४॥ (खं० १) निरु०-'वेनः' वेनतेः कान्तिकर्मणः । तस्य एषा भवति ॥१(३८)॥ अर्थः- 'वेन' (२४) कान्ति अर्थ में 'वेन' (भ्वा०प०) धातु का है । क्योंकि-मध्यम देव सब लोक का प्यारा है, जिससे कि वह सबका उपकारी है । “तस्य०” उस वेन देव की यह ऋचा है-॥१(३८)॥ (खं० २) निरु०-“अयं वेनश्चोदयत् पृश्निगर्भा ज्योति-