निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३६२ ) १० अ० ३पा० १० खं० नि) भूत या जल 'अस्य' इसके हैं । (इसी से सब को उत्पन्न करता है, पोषण करता है, और बढाता है ।) 'महत्' (च) और इससे भी किं—'महत्' बड़ा या पूजनीय 'देवानाम्' देव- ताओं का 'एकम्' एक या असाधारण 'असुरत्वम्'असुरत्व = प्रज्ञावत्व है । (उस महती प्रज्ञा और जल रूप साधनसे वह जगत्की उत्पत्ति पालन और वृद्धि करता है । क्योंकि—साधन होने पर भी निर्बुद्धि पुरुष कुछ नहीं कर सकता) अथवा 'असुरत्वम्' (अनवत्वम्) असुरत्व = प्राणवत्व है । ( क्यों कि- प्राणवान् ही सब कुछ कर सकता है निष्प्राण का कुछ शक्य नहीं) कोई 'असुरत्व' का अन्नवत्त्व अर्थ करते हैं। उनके मत में अन्न का कारण जल है, और देवता जलवाले हैं, इस प्रकार वे अन्न वाले होते हैं ॥ 'असुरत्व' क्या ? 'असु' यह प्रज्ञा या तीखी बुद्धि का नाम है । क्यों कि— "अस्यति अनर्थान्" वह अनर्थों को असन करती है- दूर हटाती है । अथवा इसमें सब अर्थ अस्त हैं, इसी से संसार के सब कार्य सिद्ध होते हैं। और 'असु (प्रज्ञा) जिसमें हो, वह 'असुर' होता है । यहां 'असु' शब्द से 'र'प्रत्यय होता है । इसी असुर शब्द के आदि अक्षर कालोप होने से 'सुर' शब्द बन जाता है, जो कि— लोक में भी प्रसि- द्ध है । और 'असुर शब्द से भाव प्रत्यय 'त्व' होने से 'असु- रत्व' होता है । असुरत्व = असुरपना ॥ 'वात' (२२) (वायु) कैसे ? 'वाति' (चलता है) इस कर्त्तृवाच्य गत्यर्थक 'वा'[अदा०प०]धातु से है । "तस्य०" उस 'वातमध्यम देवकी यह ऋचा है॥१०(३४)॥