निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त (३६३) १० अ० ३ पा० ११ख०
(खं० ११) निरु०- “वात आवातु भेषजं शम्भु मयोभु नो हृदे । प्रण आयूँषि तारिषत् ॥” [ऋ० सं० ८,८, ५४, १ । सा० सं० छ० आ० २,२, ४, १० ] वात आवातु भेषज्यानि शम्भु मयोभु च नो हृदयाय प्रवर्द्धयतु च नः आयुः । ‘अग्निः’ व्याख्यातः । तस्य एषा भवति ॥११(३५) ॥ अर्थः-“वात आवातु०” इस ऋचा का उल्लव वाता- यन ऋषि है। ‘वात:’ पवन देव ‘भेषजम्’ [भैषज्यानि] जो जो हमारे लिये पथ्य हो, उसे ‘आवातु’ हमारे सामने लावे ‘शम्भु’ और वह हमारे लिये सुखकारी हो तथा ‘हृदे’ हमारे हृदय के लिये ‘मयोभु’ सुख दायक हो, ‘नः’ [ अस्माकम् ] हमारी ‘आयूंषि’ आयु को प्रतारिषत्’ [ प्रवर्द्धयतु] बढावे । ‘अग्नि’ (१३) शब्द की व्याख्या [ ७, ४, १ ] की जाचुकी है । “तस्य०” उसकी यह ऋचा है ॥११(३५)॥ व्याख्या । “वात आवातु०” इस मन्त्र में वायु देवकी प्रार्थना से स्पष्ट कहा गया है कि- शुद्ध वायु से शरीर में नैरोग्य आयु की वृद्धि और हृदय की पुष्टि अतएव ज्ञान की वृद्धि होती है तथा शुद्ध वायु ही प्रधान पथ्य है ॥११(३५) (खंड १२) निरु०-“प्रति त्यं चारु मध्वरं गोपीथाय प्रहूय*