भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1105

हिन्दी निरुक्त ( ३४० ) १० अ० २ पा० ११ ख० शुक्र या वीर्य के गुण- अस्थि, स्नायु और मज्जा इन तीनों को ग्रहण करता है, और पुरुष का वीर्य स्त्री के रज के त्वचा मांस और रुधिर इन तीनों गुणों को ग्रहण करता है, तब दोनों पदार्थ मिल कर गर्भ बनता है । इन स्त्री पुरुषों के षः(६)गुणों के कारण ही इस स्थूल शरीर को ‘षाट्कौशिक’ (छः कोशों से बना हुआ) कहते हैं । अथवा जब स्त्री प्रेम से पुरुष के गुणों को ग्रहण करती है । और पुरुष प्रेम से इसके गुणों को ग्रहण करता है । तब परस्पर के अनुराग से उनको प्रमोद होता है, और उन प्रमुदित स्त्री पुरुषों के सम्पर्क से ‘गर्भ’ होता है । इस प्रकार ग्रहण क्रिया के संबन्ध से ‘गर्भ’ शब्द बनता है । 'सरस्वान्' (सरस्वत्) (१५) ‘सरस्वती’ शब्द [ ९,३,५ ] से व्याख्यान किया जाचुका । केवल लिङ्गका भेद है । “तस्य०” उस 'सरस्वत्'देवता की यह ऋचाहै॥१०(२३)॥ ( खं० ११ ) निरु०-“ये ते सरस्वन् ऊर्मयो मधुमन्तो घृत- श्चुतः । तेभिर्नोऽविता भव ॥” [ ऋ० सं० ५, ६, २०, ५ ] ॥ इतिसा निगद-व्याख्याता ॥१९(२४)॥ इति दशमाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥१०,२॥ अर्थः -- “येते सरस्वन्०” इस ऋचा का वसिष्ठ ऋषि है । सारस्वत हविः में विनियोग है । हे भगवन् ! ‘सरस्वन् !’ ‘ये’ जो ‘ते’ (तव) तेरी 'ऊर्मयः' लहरियें है-जिन से तू आकाश को ढांप लेता है - मेघों से