भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1104

हिन्दी निरुक्त (३३६) १० अ० २पा० १०खं० उत्पन्न हुये जगत् का 'एकः' (असपत्नः) अशत्रु या विरोधी से रहित 'पतिः' पालन करने वाला ईश्वर = स्वतन्त्र स्वामी (बभूव) हुआ था। इसी से 'सः' वह 'पृथिवीं' (च) पृथिवी को 'उत' और 'इमाम्' इस 'द्याम्' [दिवम्-च] द्युलोक को 'दाधार' (धारयति) धारण करता है। जिससे कि—वह देवता ऐसे प्रभाव वाला महानुभाव है, इससे उस 'कस्मै' (काय) क देवता के लिये [ वयम् ] हम 'हविषा' (हविः) हविः को विधेम' (दद्मः) देते हैं, या हवि के द्वारा उसकी परिचर्या करते हैं। 'हिरण्यगर्भ' क्यों ? वह सब प्राणियों का हिरण्यमय या विज्ञानमय गर्भ है। क्योंकि-वही सब भूतों के अन्तः- करण में ज्ञान रूप प्रकाश को फैलाता है। इस पक्ष में- “हिरण्यमयश्चासौगर्भश्च” अर्थात्- हिरण्यमय जो गर्भ । ऐसा समानाधिकरण (कर्मधारय) समास होता है। अथवा इसका हिरण्यमय (विज्ञानमय) गर्भ है। इस पक्ष में बहुव्रीहि समास होता है। 'गर्भ' कैसे ? गृणाति के अर्थ में 'गृभ' (ह) (क्र्या०स०) धातु से है। क्यों कि- वह सबसे स्तुति किया जाता है। अथवा 'गिरति अनर्थान्' वह सब अनर्थों को नाश करता है इससे 'गर्भ' है। अथ स्त्री का 'गर्भ' कैसे ? “यदा हि०” जब स्त्री पुरुष के गुणों को ग्रहण करती है, और इसके गुणों को पुरुष ग्रहण करता है, तब गर्भ होता है- स्त्री का रक्त या रज पुरुष के