भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1103

हिन्दी निरुक्त ( ३३८ ) १० अ० २ पा० १० खंड०

‘विदधतिः’ दानकर्मा ॥ ‘सरस्वान्’ व्याख्यातः । तस्य एषा भवति ॥१० (२३)॥ अर्थः-“हिरण्यगर्भः” इस ऋचा का हिरण्यगर्भ ही ऋषि है । क्यों कि- वह सर्वात्मक या सर्व रूप है, इससे उसके ऋषि होने पर भी प्रथम पुरुष का योग (समवर्त्तत) विरुद्ध नहीं होता । यदि सर्वात्मकता उनकी न होती तो उत्तम पुरुष होता और यह ऋचा परोक्षकृत न होकर आध्या- त्मिकी ही होती तथा इसमें उत्तम पुरुष की क्रिया होती । अथवा परब्रह्म की जो हिरण्यगर्भ की अवस्था है, जो प्रति- कल्प में आविर्भूत [प्रकट] और तिरोभूत (अन्तर्धान) होती रहती है,और जो बुद्धिपूर्वक- जिससे ईश्वर अपनी इच्छा से ज्ञान पूर्वक रचता है , तथा जो नित्य है, उस नित्य हिरण्यगर्भावस्था में नित्य मन्त्र आश्रयमात्र से अभिधाता या वक्ता [ऋषि] को लेकर प्रवृत्त होता हुआ अनुवाद करता है, वास्तव में नित्य मन्त्र का कोई वक्ता नहीं है, इससे उस मे पुरुष का योग विवक्षित नहीं होता है, अर्थात् उत्तम पुरुष होने पर भी वह ऋचा वैसी ही है, जैसी प्रथम पुरुष के योग में । यदि मन्त्रकृतक = किसी का किया हुआहोता तो नियम से ही यहां उत्तम पुरुष होता ॥ ‘हिरण्यगर्भः’[एव] हिरण्यगर्भ ही ‘भूतस्य’[अस्य उत्पन्न- स्य स्थावरजङ्गमस्य जगतः] इस स्थावर जङ्गम सम्पूर्ण जगत् के ‘अग्रे’ पहिले ‘जातः’ उत्पन्न हुआ ‘समवर्त्तत’ भले प्रकार वर्त्तमान था । और वह पहिले हुआ हुआ, उस पीछे से