भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1102

हिन्दी निरुक्त ( ३३१ ) १० अ० २ पा० ९ खंड 'जुहोति' (जु० प०) धातु दानार्थक है । 'क' (१४)- यह वक्तव्य है। सो यह महान् आत्मा = सर्वात्मा (सबका अन्तर्यामी) ज्ञान स्वरूप देव है । क्यों ? कमन या कामियों के काम्य [ बाञ्छनीय ] अर्थों में साधन होता है। अथवा कमण या स्वयमेव कमण करने वाला होने से 'क' है। अथवा 'क' सुख स्वरूप होने से 'क' है । "तस्य०" उस 'क' देव की यह ऋचा है ॥६[२२]॥ ( खं० १० ) निरु०- हिरण्यगर्भः समवर्त्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् । स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥* (ऋ० सं० ८, ७, ३, व० १, १०, १०, ९ सू० १)॥ हिरण्यगर्भो हिरण्यमयो गर्भः । हिरण्यमयो गर्भोऽस्य- इति वा । 'गर्भो' गृभेः गृणात्यर्थे । गिरति अनर्थान्- इति वा । यदा हि स्त्री गुणान् गृह्णाति गुणाश्च अस्या गृह्यन्ते अथ गर्भो भवति, समभवद्-अग्रे भूतस्य जातः पतिः एको बभूव, सः धारयति पृथिवीं च दिवं च, "कस्मै देवाय हविषा विधेम" इति व्याख्यातम् ।