भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1100

हिन्दी निरुक्त ( ३३५ ) १० अ० २ पा० ९ खं० दो पुत्र यम । इन में भी एक यम पार्थिव अग्नि ही होता है और इसी मन्त्रमें “इह” यह इस लोक का वाचक पद भी और पुष्ट करदेता है । और (६) “तृतीयोऽग्निष्टे पतिः” अर्थात्—हे कन्ये ! तीसरा तेरा पति अग्नि है। यह निगम “पतिर्जनीनां” के साथ संबाद करके अत्यन्त ही यम शब्द की अग्निवाचकता को सिद्ध कर देता है । इसी प्रकार शब्द के अर्थ को निश्चय करने में अनेक निगमों की सहायता लेनी चाहिये। यह भाष्यकार ने प्रदर्शन किया है । “जारः कनीनाम्” निगम पर ध्यान देने से निश्चय होता है कि-एक बार अग्नि के संनिधान में कन्याओं का विवाहसंस्कार होने के पश्चात् फिर विवाह संस्कार नहीं हो सकता । क्योंकि- जो कन्याभाव जीर्ण होचुका वह फिर नया नहीं होसकता । पुनर्विवाह वेद में ढूंढने वालों को इस निगम पर दृष्टि डालना चाहिये ॥ ८ (२१) ॥ [ खं० ६ ] निरु०- “मित्रोजनान्पातयति ब्रुवाणो मित्रो दाधार पृथिवी मुतद्याम् । मित्रः कृष्टी रनिमिषा- भिचष्टे मित्राय हव्यं घृतवज्जुहोत ॥” ( ऋ० सं० ३, ४, ५, १ ) मित्रः जनान् आयातयति प्रब्रुवाणः शब्दं कुर्वन् मित्रएव धारयति पृथिवीं च दिवं च, मित्रः कृष्टीः अनिमिषन् अभिविपश्यति-इति ।