भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 113

११४ अ० १ पा० ४ व० ४ । तक्षा कहा जाता है, और कोई तक्षण करनेसे भी 'तक्षा' (बढ़ई) नहीं कहाता । वे पूछें कि-क्या कारण है ? तो हम कहेंगे कि- लोकसे पूछो । और उसीको उपालम्भ करो । मैंने ऐसा नियम नहीं किया है । और यह कि-लोकमें बहुत मनुष्य समान कर्म करते हैं किन्तु उनमें से कोई सफल होते हैं और कोई निष्फल । वेदादिकोंमें कोई शब्द अन्य अर्थोंके होते हुए भी एक अर्थसे ही संयुक्त होते हैं । यह भी ठीक ही है, क्योंकि-शब्दोंकी अवस्थिति स्वभावसे ही उनकी अनेक क्रियाओंसे उत्पत्ति होनेपर भी किसी क्रिया- पर अवलम्बित होती है । अथवा ऐसा नियम क्रियाके अतिशय पर होता है, जो जिस कामको अधिकतासे करता है, उसमें अन्य क्रियाओंके होते हुए भी उसी क्रियासे नाम पड़ता है। यहां यह समाधान है कि-अथवा हम नहीं कहते कि-"जो जिस कालमे जहां तक्षण करता है, वही तक्षा है" बल्कि "जो जिस कालमे जहां तक्षा है, वही तक्षा है" । यह लक्षण नियत नहीं है, जहां इच्छा हो वहीं इस नियमको काममें ला सकते हैं । अर्थात् और पदार्थोंमें और भी क्रिया नियततर हैं, जिनके कारण उनके अन्य नाम पड़ते हैं। तक्षा तो विशेषकर तक्षण ही करता है, अन्योंमें वह प्रधानतासे नहीं किन्तु और और ही क्रिया प्रधान हैं तक्षण प्रसङ्गात् होता है। जीवन नाम इक्षुरस अथवा कोई शाककी जाति है । भूमिज नाम अङ्गारक या मङ्गल ग्रहका है । इनकी शक्तिका विचार भी तक्षाके समान है। ३ य प्रश्नका उत्तर भी द्वितीय उत्तरसे हो गया । देखते हैं कि- अनेक क्रिया-युक्त पदार्थोंके नाम एक क्रिया पर ही होते हैं । जैसे- तक्षा, परिव्राजक, ये ही उदाहरण हैं। क्योंकि तक्षा अन्य कर्मों को