भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 114

हिन्दी निरुक्त । ११५ भी करता है, किन्तु उन क्रियाओंसे उसके नाम नहीं होते । इससे अनेकोंका एक क्रियाके सम्बन्धसे एक नाम, तथा एकके अनेक क्रियाओंके सम्बन्धसे अनेक नाम, ये दोनों बातें अयुक्त हैं। क्योंकि लोकमें शब्दोंका नियम स्वभावसे ही व्यवस्थित है। इससे व्यव- हारको अप्रसिद्धिका दोष नहीं है। इससे जो तुमने कहा कि-व्यव- हारकी अप्रसिद्धि दोषसे "सब नाम आख्यातज नहीं" यह अयुक्त है। ४र्थ प्रतिसमाधान—तुमने कहा कि—"ऐसे ही सब पदार्थों के नाम होने चाहिये जिनसे उनकी क्रिया प्रतीत होती रहे" किन्तु यह शब्दका स्वभाव है,—जोकि—"सब वैसे हो बोले जाते हैं, जैसे जैसे प्रतीतार्थ होते है" उसमें मैं आपका अपराधी नहीं बनता, और न शास्त्र ही । क्योंकि जिस प्रकार शब्द पहलेसे अवस्थित हैं, उन्हींका अभ्याख्यान या अनुवाद है, मैं शब्दोंका बनानेवाला नहीं। जो इन शब्दोंके प्रयोग करनेवाले हैं, उन्हींको चिढ़ाओ अथवा निराकरण, करो, यदि कर सको। प्रश्न हो कि—क्यो लोकमें कुछ ही शब्द प्रतीतार्थ बोले जाते हैं ? इसका भी उत्तर यही है कि--"यह शब्दोंका स्वभाव है,—कोई प्रतीतार्थ और कोई अप्रतीतार्थ" उनको भी शास्त्रसे प्रतीतार्थ हो करना चाहिये। यही शास्त्रका प्रयोजन या उसमें शास्त्रपना है, जो अप्रतीतार्थ नामोंको धातु—प्रत्यय आदिके विभागसे प्रतीतार्थ करदे। इससे कुछ लोकमें प्रतीतक्रिय हैं और कुछ को शास्त्र कर देता है। क्योंकि—शास्त्रके जितने लक्षण हैं वे सब रूढि शब्दोंमें उनके अनुसार ही चलते हैं, जैसा उनमें देखते हैं, वैसाही कार्य्य करते हैं। रूढि स्थलमें शब्दकी प्रधानता और लक्षणकी गौणता रहती है। प्रतीतक्रिय शब्दोंमें लक्षणको प्रधानता और शब्दकी गौणता रहती है।