निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११६ अ० १ पा० ४ ख० ४ इसके अतिरिक्त यह भी है कि—केवल निरुक्त ही में रूढि शब्दोंको प्रतीतक्रिय.बनानेका अभ्यास नहीं किन्तु व्याकरणमें भी कुछ ऐसे शब्द कृदन्त आदि स्थलमें साधन किये गये हैं, जैसे— व्रतति, दमूनाः, जाट्यः, आटणारः जागरूकः, दर्विहोमी । व्रतति नाम वल्ली या लता । दमूनाः, दममनाः या दमनशील । जाट्य अटावान् । आटणार अटनशील । जागरूक जागरणशील । दर्वि- होमी दर्वी या चाटूसे होम करनेवाला । इसी प्रकारसे रूढि शब्द प्रतीतार्थ भी हो जाते हैं, यह शाकटायनका अभिप्राय है। इससे “सब नाम आख्यातज नहीं” यह पक्ष अयुक्त है। ५म प्रतिसमाधान—शब्दके प्रयोगके अनन्तर उसके धातु आदिके विचारका प्रश्न भी ठीक नहीं है, क्योंकि—सिद्ध पदके उच्चारणमें ही योग या शास्त्रके लक्षणकी परीक्षा होती है। क्योंकि-लक्षणके सामने जबतक लक्ष्य न हो कैसे उसकी परीक्षा हो सकती है। भाव यह है कि--जो लक्षण, शब्दोंको देखकर बने है, वे उनके होने पर ही अपना काम करेंगे, शब्दके व्याहरणसे पहिले उनका कोई व्यापार नहीं होता । जोकि-यह प्रश्न है कि—“यदि प्रथनसे ‘पृथिवी’ है तो इसे किसने प्रथन किया और किस आधार पर स्थित होकर ?” हम इसका यही उत्तर देते हैं, किसीने इसका प्रथन किया है, इससे यह पृथिवी है । दूसरा यह प्रश्न कि—“जब यह प्रथित नहीं थी, तो यह पृथिवी कैसे हुई ?” यद्यपि किसीने भी इसका प्रथन नहीं किया, किन्तु देखनेमे यह फैली हुई है, इसीसे यह पृथिवी है। तीसरा यह प्रश्न कि– किसने इसका प्रथन किया और किस आधार पर स्थित होकर ? यह भी ठीक नहीं, क्योंकि-अन्य प्रकारसे धातुका अर्थ संघटित नहीं होता, हम वैसाही निर्वचन करेंगे जैसे