निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविरोध न हो । इससे शाकटायनका अभिप्राय अविरुद्ध है यह सिद्ध हुआ । यदि पृथिवीके पृथुत्वको प्रत्यक्ष होने पर हमारा उपालम्भ किया जाता है, तो इसमें मेरा ही उपालम्भ नहीं बल्कि—सम्पूर्ण प्रत्यक्षवादोकी ही निन्दा हो जाती है । गार्ग्य मुनि प्रत्यक्षमें भी दोषारोप करते हैं, इस लिये यह अयुक्त है क्योंकि—इससे प्रत्यक्ष- की हानि है जोकि—सर्वथा अनिष्ट है अतः पृथुत्वके प्रत्यक्ष दर्शन से 'पृथिवी' कही जाती है यह ठीक है । ६ठा प्रतिसमाधान । अन्य पदोंके खण्डो (टुकड़ों) को लेकर अन्य पदोंकी व्युत्पत्ति आदिका आक्षेप भी ठीक नहीं है, क्योंकि— जो पुरुष अनन्वित अर्थमें असम्बद्ध संस्कारसे शब्दोंका संस्कार करता है, वही पुरुष निन्दनीय है किन्तु शाकटायन आचार्य ऐसा नही करते, बल्कि—एक अभिधान (नाम) में जितने अर्थ होते है, उनके अनुकूल अनेक धातुओसे एक एक नामका संस्कार करते हैं, किन्तु मूढतासे नहीं । इस लिये गार्ग्य मुनिने जो शाकटायन की निन्दा की है वह उनके अभिप्रायको न समझकर की है। यह भी उनको जानना चाहिये था कि—कोई पुरुष अशिक्षित होनेके कारण एक धातुसे होनेवाले नामको भी नहीं जान सकता, बहुत धातुओंसे होनेवालेका जानना तो उसके लिये असंभव ही है । अपिच लोकमे ऐसे भी पुरुष हैं, जो 'कारक', 'हारक' आदि स्पष्टक्रिय शब्दोको भी नहीं जान सकते कि—ये किन धातुओंसे बने हुए हे किन्तु यह पुरुषका दोष है, शास्त्रका नहीं, जाकि—वह शब्दोंको अर्थके पीछे नहीं चला सकता । शाकटायनने 'सत्य' शब्दकी भी व्याख्या ठीक ही की है, वह 'सत् अर्थको ही प्रतीत कराता है।' इससे शाकटायनमत युक्त है। गार्ग्य मुनि जिन रूढि शब्दोंको अधातुज मानते हैं, यह भी