निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११८ अ० १ पा० ४ ख० ४ । ठीक नहीं है। क्योंकि—रूढि शब्दोंकी व्युत्पत्ति तथा कहीं एक धातु और कहीं अनेक धातुओंसे एक नामकी व्युत्पत्ति मन्त्र और ब्राह्मणमें देखी जाती है जोकि—हमारे सबसे बड़े या पूजनीय प्रमाण हैं। जैसे—“सर्पिः” शब्दकी व्युत्पत्ति “यदसर्पत् १ तत्सपिः” इस मन्त्रमें और “नवनीत” शब्दकी व्युत्पत्ति २ “यन्नवनीतमभवन्” इस मन्त्रमें की है। इसी प्रकार ब्राह्मणमें ‘हृदय’ शब्दकी व्युत्पत्ति तीन धातुओंसे की है। ‘हृ’ हृञ् हरणे (हरति) धातु, ‘द’ अक्षर डुदाञ् दानेके ‘ददति’ रूपसे, तथा ‘य’ अक्षर इण् गतौके इकारके स्थानमें यकार आदेश करके लिया है। यही नहीं किया, बल्कि—इन तीनों अक्षरोंकी उत्पत्तिको जानने वालेके लिये तीन फल भी बताये हैं। तदेतत् त्र्यक्षरं हृदयमिति, हृ इत्येक- मक्षरं † मभिहरन्त्यस्मै स्वाश्चान्ये च य एवं वेद, द इत्येकमक्षरं ददत्यस्मै स्वाश्चान्ये च य एवं वेद, यमित्येकमक्षरमेति स्वर्गं लोके य एवं वेद। (श० ब्रा० १४,८,४,१) ७म प्रतिसमाधान। “पूर्वकालीन नामकी व्युत्पत्ति अपर कालीन क्रियासे होना अयुक्त है” यह आक्षेप भी मानने योग्य नहीं है। १—जो किसी द्रव्यपर पडते ही फैल जाता है। १—जो भोजनमे नवीन निकाला हुआ हो उपयुक्त होता है। सर्पि और नवनीत यह दोनों नाम घृतके ही हैं। दूसरा मन्त्र भी सर्पि नामकी व्युत्पत्तिके लिये हो सकता है। † हृदय नाममे ‘हृ’ अक्षर इस लिये है कि—जो कुछ प्राणी नाना पदार्थों को हरण करते हैं, वह इस हृदयके लिये ही करते हैं, जो देते हैं वह इसीके तावार्थ देते हैं इसलिये (द) अक्षर है, और हृदय या अन्तःकरण ही स्वर्गको जाता है क्योंकि—विभु आत्माका गमन संभव नहीं इसलिये यकार अक्षर है। (ऐसा अर्थ भी प्रतीत होता है)