निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । ११६ क्योंकि-हम देखते हैं कि-पूर्वोत्पन्न द्रव्योंका नाम अपर कालीन क्रियाओंसे होता भी है और द्रव्योंका नहीं भी होता । जैसे कि—“बिल्वादः” यह नाम सत्वकी भाविनी विल्वभक्षण क्रिया की कल्पना करके भी हो जाता है । तथा पश्चात् कालमें होनेवाली चूड़ालम्बन क्रियासे भी किसी सत्वका “लम्बचूडक” यह नाम पड़ जाता है । “बिल्व” शब्द भरण अथवा भेदन क्रियासे होता है । क्यो- कि—उसमें बीज भरे रहते हैं, तथा दुर्भिक्ष आदिके समय खानेवाले- का भरण (पालन) करता है । अथवा खानेके लिये वह अवश्य भेदन किया (फोड़ा) जाता है । यहां ऐसी आपत्ति भी उठाई जा सकती है कि—अति मधुर जैसा पूर्व-उत्तर पक्षोंकी रचनापूर्वक नामके आख्यातजत्वको लेकर किस लिये यह व्याख्यान किया है ? यह विस्तृत व्याख्यान शिष्योकी बुद्धिके वर्द्धनार्थ किया गया है, जिससे कि --वे व्युत्पन्नबुद्धि होकर अप्रतिबन्ध (बेरोक टोक) से सब ओर चलनेवाले लौकिक तथा वैदिक शब्दोंका निर्वचन कर सकें । किन्तु यह प्रयोजन नहीं कि—“कोई व्याकरण तथा निरुक्त अप्रमाण है”, बल्कि वेदाङ्ग होनेसे सभी प्रमाण हैं । कोई यह नही कह सकता कि—उन्हींका फल साधु है, औरोंका नहीं । भाव यह है कि-गार्ग्य व शाकटायन आदि सभी आचा- योंके विचार युक्तिसम्पन्न और प्रमाण हैं । वक्ता व श्रोताकी बुद्धि वा इच्छाके विशेषसे एक पक्षकी गौणता और दूसरेकी मुख्यता प्रतीत होने लगती है । वास्तवमे सभी युक्तियां माननीय हैं । समाप्तश्चतुर्थः पादः ।