निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३८१ ) १० अ० ४ पा० १० खं० रूप में वर्णन की हुई है । ] [ ऋषि देवता के दर्शन करके किसी से कहता है । ] ‘तम्’ उस वायुदेव को ‘माता’ [ एषा माध्यमिका वाक् ] यह मध्यम लोक की वाणी रूप माता ‘रेढि’ [लेढि] चाटती है । ‘सः उ’ और वह भी ‘मातरम्’ माता को ‘रेढि’ चाटता है । अर्थात्—दोनों परस्पर के आश्रय होने के कारण अध्यात्म के समान हैं । अध्यात्म मन्त्र में स्तोता और स्तुत्य दोनों भाव एक ही में आजाते हैं, वैसे ही यहां एक ही देवता कर्त्ता और कर्म का काम कर रही है । ‘पुरूरवाः’ [३२] क्या ? बहुधा रोने वाला । “तस्य०” उस पुरूरवस् देवता की यह ऋचा है—॥६(४६) (खं० १०) “निरु०- समास्मिञ्जायमान आसत ग्ना उतेमवर्द्धन्नद्यः १ स्वगूर्त्ताः । महे यत्त्वा पुरूरवो रणाय वर्द्धयन्दस्युहत्याय देवाः ॥”( ऋ० सं० ८, १, ३, २ )॥ समासत अस्मिन् जायमाने ग्नाः गमनात् आपः देवपत्न्यो वा । अपि च एनम् अवर्द्धयन् नद्यः ‘स्वगूर्त्ताः’स्वयंगामिन्यः। महते च यत्त्वा पुरूरवो ‘रणाय’रमणीयाय संग्रामाय अवर्द्धयन् दस्यु- हत्याय च देवा देवाः ॥१०(४७)॥ इति दशमाध्यायस्य चतुर्थ पादः ॥ १०, ४॥