निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ
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अथ एकादशाध्यायः । प्रथमः पादः । ( खं० १ ) ⸪ ( अथ षट्त्रिंशत्पदानि ) निघ०-श्येनः ॥१॥ सोमः ॥२॥ चन्द्र- माः ॥ ३ ॥ मृत्युः ॥४॥ विश्वानरः ॥५॥ धाता ॥ ६ ॥ विधाता ॥ ७ ॥ निरु० 'श्येनो' व्याख्यातः । तस्य एषा भवति- ॥१॥ अर्थः- 'श्येन' ( १ ) शब्द की व्याख्या अ० ४ पा० ४ खं० ३ शब्द ५१ पर होचुकी है- "शंसनीयं गच्छति" 'बहुत अच्छा जाता है'। किन्तु यहा मध्यम देव उसका अभि- धेय ( अर्थ ) कहा जाता है ॥ "तस्य०" उस 'श्येन' की यह ऋचा है- ॥ १ ॥ ( खं० २ ) निरु०- " आदाय श्येनो अभरत्सोमं सहस्रं सवां अयुतं च साकम् । अत्रा पुरन्धिर जहादरा- तीर्मदे सोमस्य मूरा अमूरः ॥" [ ऋ० सं० ३, ६, १५, ७ ) ॥ आदाय श्येनः अहरत् सोमं, सहस्रं सवान्,