निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३८६ ) ११ अ० १ पा० ३ खं० वाले सत्र में 'पुरन्धिः' बहुत धनके देने वाले 'अमूरः' (अमूढः) अमूढ या सावधान श्येन ( इन्द्र ) ने 'मूराः' मूढ 'अरातीः' (अमित्रान् अदानान्) न दान करने वाले शत्रुओंको 'अजहात्' ( अभ्यजयत् ) जीता । कब ? "सोमस्य मदे " सोमके मद को प्राप्त होने पर ॥ इस मन्त्र में सोम के पान और शत्रुओं के जय रूप लक्षण से 'श्येन' मध्यम इन्द्र ही है, और इन्द्र के सूक्त में भी सोम के पान से इस की स्तुति हुई है इस से भी इसे इन्द्र मानते हैं । 'सोम' (२) क्या ? ओषधि । किस धातु से ? सुनोति ( 'सु' स्वा० उ० ) धातु से । क्यों ? ' यद् एनम् अभिषुण्वन्ति' जिससे कि इसे निचोड़ते हैं । इसका बहुत करके नैघण्टुक वृत्त है-प्रायः दूसरे की प्रधान स्तुति में गौण या विशेष रूप से प्रयोग आता है । कहीं इस की प्राधान्य स्तुति भी आती है, जो कि-आश्चर्य जैसी होती है । उसके दोनों प्रकार दिखाने के लिये "पाव- मानी " ऋचाओं में उदाहरण देंगे ॥ २ ॥ ( खं० ३ ) निरु०- “ स्वादिष्ठया मदिष्ठया पवस्व सोम- धारया । इन्द्राय पातवे सुतः ॥ ” ( ऋ०सं० ६, ७, १६, १ । सा० सं० छ० आ० ५, २, ४, २) ॥ इति सा निगदव्याख्याता ॥ अथ एषा अपरा भवति चन्द्रमसो वा एतस्य वा- ॥ ३ ॥