निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३६० ) ११ अ० १ पा० ५ खं० वा “वायुः सोमस्य रक्षिता”, वायुम्-अस्य रक्षि- तारम्-आह साहचर्याद् रसाहरणाद्वा । 'समानां' संवत्सराणां “मास आकृतिः” सोमो रूपविशेषः ओषधिः, चन्द्रमा वा । ‘चन्द्रमाः’ चायन् द्रमति । चन्द्रो माता, चान्द्रं मानम्, अस्य-इति वा । ‘चन्द्रः’ चन्दतेः कान्तिकर्मणः । ‘चन्दम्’ इत्यपि अस्य भवति । चारु द्रमति । चिरं द्रमति । चमेर्वा पूर्वम् । ‘चारु’ रुचेर्विपरीतस्य । तस्य एषा भवति—॥५॥ अर्थ :-“यत्त्वा देव ! प्रपिबन्ति तत आप्या- यसे पुनः०” हे देव ! सोम ! जो तुझे तीनों मुख्य २ सबनों में ऋत्विज् और यजमान पान करते हैं-पीना आरम्भ करते हैं, तब फिर तू बढ़ता है । ( यह व्याख्या नाराशंसों के अभिप्राय से है-इस में सोम को मनुष्य पीते हैं और वह बढ़ता है, इस लिये मनुष्यों के संबन्ध से यह व्याख्या है । ) अथवा ये पूर्वपक्ष [ शुक्लपक्ष ] और अपरपक्ष (कृष्णपक्ष) हैं- हे देव ! सोम ! ( चन्द्र ! ) जब अपरपक्ष या कृष्णपक्ष में तुझे रश्मिएं पान कर जाती हैं, तो फिर तू पूर्वपक्षमें [शुक्लपक्षमें] कलाओं से बढ़ जाता है । [ यह अधिदैवत पक्ष है । ] “वायुः सोमस्य रक्षिता” वायु सोमका रक्षा करनेवाला