भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1154

हिन्दी निरुक्त ( ३६१ ) ११ अ० १ पा० ५ खं० है। [ इस वाक्य में मन्त्र का द्रष्टा ऋषि वायुको सोमका रक्षक कहता है। क्योंकि—वायु के साथ ही वह विचरता है, वायुके विना कभी नहीं रहता । अथवा रस के हरण से वायु सोमका रक्षक है। क्योंकि—वह सब रसों का शोषण करने वाला है, वह सोम को सुखा देने में समर्थ होकर भी उसे नहीं सुखाता; इस से उसका रक्षक है ॥ ] [ यह पाद दोनों पक्षों में समान है ] “समानां मास आकृतिः” सोम ओषधि अथवा चन्द्रमा अपने रूप विशेषों से, अपने रूपों के भेदों से समाओं का (संवत्सरों का) मास रूप होकर करने वाला है। (चन्द्रमा शुक्लपक्ष में एक २ दिन में एक २ कला से बढता हुआ पन्द- रह दिन में पूर्ण कलावान् होजाता है और कृष्णपक्ष में एक २ कला से घटता हुआ पन्दरह दिन में सब कला शून्य होजाता है, इस प्रकार दो पक्षों के द्वारा एक मास और बारह मासों से एक संवत्सर को बना देता है। उसी प्रकार सोम ओषधि के भी पन्दरह (१५) पत्ते होते हैं, और चन्द्रमा की कलाओं के साथ २ एक २ दिन में एक २ पत्ता उगता है और उसी क्रम से पन्दरह दिन में पन्दरह पत्ते होजाते हैं, तथा कृष्णपक्ष में एक२ पत्ता घटकर पन्दरह दिन में सोम पत्ररहित होजाता है और चन्द्रमा के समान ही दो पक्षों के द्वारा मासको और बारह मासों के द्वारा संवत्सर को बना देता है इस रीति के अनुसार दोनों ही (ओषधि और चन्द्रमा) संवत्सर रूप काल के निर्माता हैं। ] ' चन्द्रमाः ' क्यों ? ' चायन्द्रमति ' देखता हुआ चलता है- सब प्राणियों के ऊपर स्थित हुआ हुआ देखता हुआ जाता है। 'चायन्' से पूर्व भाग और 'द्रमति' से उत्तर भाग