निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३६३ ) ११अ० १पा० ६खं० द्वितीयः पादः, इत्येके। “भागं देवेभ्यो विदधात्या- यन्”- इति अर्द्धमासेज्याम्-अभिप्रेत्य । प्रवर्द्धयते चन्द्रमा दीर्घमायुः ॥ ‘मृत्युः’ मारयति- इति सतः “मतं ़यावति इति वा शतबलाक्षो मौद्गल्यः । तस्य एषा भवति ॥६॥ अर्थः-“ नवोनवो भवति०” इस ऋचा का सूर्या ( सूर्य पत्नी ) ऋषि है द्व्यक्ष चान्द्रमस चरुमें और राजयक्ष्म- गृहीतेष्टि में विनियोग है । “नवो नवो भवति जायमानः” (चन्द्रमा उत्प- न्न होता हुआ नया नया होता है' यह पाद् पूर्वपक्ष (शुक्ल- पक्ष ) के आरम्भ के अभिप्राय से है। क्योंकि— शुक्लपक्ष के आदि में सदा ही प्रतिमास सूर्य के अस्त होने के पीछे पश्चिम दिशा में अपनी वृद्धि को आरम्भ करता हुआ उदय होता हुआ नया नया होता है । “अन्हां केतुः-उषसाम्-एति अग्रम्” 'दिनोंका केतु = लक्षण या करने वाला चन्द्रमा उषाओं के आगे आता है, यह द्वितीय पाद् अपरपक्ष या कृष्णपक्ष के अन्त (समाप्ति) के अभिप्राय से है। क्योंकि- कृष्णपक्ष के अन्त में क्षीण हुआ चन्द्रमा जो अपनी कलाओं के घटाव बढ़ाव से अथवा गतियों के भेद से प्रतिपदा आदि तिथियों को बता देता है, उषा के प्रकाश के समीप में अर्थात् सूर्य के उदय से पहिले पूर्व दिशामें दिखाई देता है। कोई