निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३६६ ) ११ अ० १ पा० ८ खंड आता है । इस के अतिरिक्त यह भी है कि-चन्द्रमा औषधि सोम के रूप में यज्ञ में आता है, और वह सोम इन्द्र मध्यम देव का अन्न है, अन्न अन्नके खाने वाले का आत्मा ही होता होता है, इस से भक्ष्य भक्षक के अभेद के द्वारा भी चन्द्रमा मध्यम होता है । इस प्रकार चन्द्रमा के मध्यम होने में कोई दोष नहीं ॥ “नवो न॑वो भवति” इस मन्त्र में प्रतिमास नये उगने वाले चन्द्रमा में दीर्घ आयु देने का गुण वर्णन किया है, इसी मन्त्र के मूलपर लोग अब भी नए चन्द्रमा का दर्शन अपनी मङ्गल कामना से करते हैं ॥ ६ ॥ ( खं० ७ ) निरु०-“परं मृत्यो अनुपरेहि पन्थां यस्ते स्व इतरो देवयानात् । चक्षुष्मते शृण्वते ते ब्रवीमि मानः प्रजां रीरिषो मोत वीरान् ॥” (ऋ०सं०७,६ २६, १ । य०वा०सं० ३५, ७ । आ०गृ० ४,६) परं मृत्यो ध्रुवं मृत्यो ध्रुवं परेहि मृत्यो कथितं तेन मृत्यो मृतं च्यावयते भवति मृत्यो मदेर्वा । मुदेर्वा । तेषामेषा भवति ॥७॥ ( खं० ८ ) निरु०- “त्वेषमित्था समरणं शिमीवत्तोरिन्द्रा- विष्णू सुतपा वा मुरुष्यति या मर्त्याय प्रति