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भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 1158, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 1158

हिन्दी निरुक्त ( ३६५ ) ११ अ० १ पा० ६ खं० इस ऋचा से पहिले “पूर्वापरं चरतो मायैतैतो” ( ऋ० सं० ८, ३, २३, ३ ) अर्थात्—'ये दोनो [ सूर्य और चन्द्रमा ) माया से पूर्व और पश्चिम विचरते हैं' यह ऋचा है जो मित्रावरुण देवताओं के एक हविः में विनियोग की गई है। इसी की अपेक्षा से यह ऋचा भी सूर्य चन्द्रमा दोनों देवताओं की है। क्योंकि—इस में भी ,, अन्हां केतुः” दिनों का करने वाला यह विशेष लिङ्ग है इस पक्ष में केवल दूसरा पाद् सूर्य की स्तुति और शेष तीन पाद् चन्द्रमा की स्तुति हैं। जैसे— ( जो चन्द्रमा उत्पन्न होता हुआ नया २ होता है, जो देवताओं को भाग देता है, और जो दीर्घ आयु को देता है, सो हमारे लिये यह करे। और जो सूर्य अपने उदय अस्त के द्वारा दिनों को करने वाला है, तथा उषाओं के आगे चलता है, वह हमारे लिये ऐसा करे।' ( यह हम चाहते हैं ) ॥ चन्द्रमा मध्यमस्थान है। यद्यपि पौराणिक आचार्य चन्द्रमा को सूर्य से भी हजारों लाखों योजन ऊंचा कहते हैं तथापि “सभी देवता द्युस्थान हैं और उनका विशेष २ कर्मों के संयोग से स्थान का भेद हो जाता है” इस नियम के अनुसार मध्यमस्थान के वृष्टि, वृत्र का वध और बलकृति ये विशेष कर्म हैं, और वे इन्दु के “वधैरजेत दुर्मतिम्” ( नि० अ० १० पा० ४ खं० मन्त्र ) में देखे जाते हैं, इन्दु और चन्द्रमा एक ही देवता प्रसिद्ध है, तथा इन्द्रके सूक्तों में बहुतायत से चन्द्रमा आता है, इस कारण से चन्द्रमा मध्य स्थान है द्युस्थान होने पर भी कर्म संयोग से मध्यमस्थान हो

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