निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ४०२ ) ११ अ० १पा० ११खं० नरः' 'देवः' विश्वानर देव ने 'विश्वजन्यम्' ( सर्वजन्यम् ) सब जनों के लिये हित 'अमृतम्' अमर सूर्यनाम 'ज्योतिः' ज्योति को 'उद्-अश्रेत्' ( उदशिश्रियत् ) ऊपर को उठाया है क्योंकि—सब चलने वाले पदार्थों की गति वायु से ही होती है, इस कारण सूर्य का भी ऊपर को उठाना या चलाना उसी का कार्य हो सकता है । इस प्रकार 'विश्वानर' ज्योति को उठाता है । इस कथन से 'विश्वानर' मध्यम होता है । इसी अभिप्राय को लेकर कहा है—“कमन्यं मध्यमादेव- मवक्ष्यत्” मध्यम के अतिरिक्त और किस को ऐसा कहा जाता । इस ऋचाका आधा पिछला भाग उषा देवता का है, इससे भाष्यकार ने उसे यहां छोड़ दिया है । 'धाता' ( ६ ) क्यों ? 'सर्वस्य विधाता' सब का करने वाला है । क्योंकि—सब की सृष्टि जलसे ही होती है, इससे यह देवता मध्यम है । “तस्य०” उस धाता की यह ऋचा है ॥१०॥ ( खं० ११ ) निरु०-“धाता ददातु दाशुषे प्राचीमूर्जीवातुम- क्षिताम् । वयं देवस्य धीमहि सुमतिं सत्यधर्मणः” ( अ०सं० ७, १७, २ ) धाता ददातु दत्तवते प्रवृद्धां जीविकाम्-अनुप- क्षीणां, वयं देवस्य धीमहि सुमतिं कल्याणीं मतिं सत्यधर्मणः ।