निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ४०६ ) ११ अ० २ पा० १ खं० 'तेषाम्०" उन देवगणों में मरुत् पहिले आते हैं। [क्यों- कि-वृष्टि कर्म में पहिला कार्य ये ही करते हैं।] 'मरुत्' (८) क्यों हैं ? वे मित रवण करते हैं-मन्द २ मिला हुआ शब्द करते हैं। किसी के मत में अमित रवण करते हैं [भैष्यके पाठ में 'अकार की सन्धि भी निकल सकती है, इसी पर यह दूसरा मत अवलम्बित है]। अथवा मित रोचते हैं, थोड़ा२ प्रकाशते हैं। किसी के मतमें अमित (बहुत) रोचते हैं इससे 'मरुत्' हैं। अथवा महत् द्रवण करते हैं-बड़ी दौड़ करते हैं इस से 'मरुत्' हैं। "तेषाम्०" उन मरुतों की यह ऋचा है ॥१ (१३) ॥ व्याख्या। मरुतः। इस पद में 'मरुत्' शब्द से प्रथमा विभक्ति का बहुवचन संयुक्त है। इससे बहुत मरुत् देवताओं की प्रतीति होती है। जब वायु देवता ही भेद से देखा जाता है, तब वही मरुत् नाम वाला तथा बहुवचन के योग्य हो जाता है। ये कोई दूसरे देवता नहीं हैं। इसी से इन आठ गण देवताओं में इनके प्रथम आने का कारण वही है, जो वायु का है। अर्थात्- इनके प्राथम्य के जानने के लिये वायु देवता का व्याख्यान पढना चाहिये। विशेष यही है कि-जब कोई कर्म बहुत रूपों का ही साध्य होता है, तब वह मध्यम देव वायु ही बहुधा (बहुरूप) हो जाता है। बहुवचन युक्त मरुत् नाम वाले जो ४६ वायु के रूप हैं, उन में सात (७) सात (७) के ७ गण (समूह हैं', और उनके शुक्रज्योतिः, चित्रज्योतिः,- इत्यादि पृथक् २ नाम भी हैं। इन सब का कारण भी कर्म और बुद्धि का भेद ही है। ये सप्त गण मारुत गणों के श्रौत