भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 1170, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1170

कर्म में जहां सप्त कपाल पुरोडाश होते हैं, तथा पुराणों में इसी प्रकार से प्रसिद्ध हैं। दिति ने अपने पुत्र वृत्रासुरके वध का बदला लेने के लिये पुंसवन व्रत धारण करके मारीच कश्यप से इन्द्र का वध करने वाला एक गर्भ धारण किया था इन्द्र ने समय पाकर उस गर्भ के ७ टुकड़े किये और उन में एक १ के फिर सात २ टुकड़े किये। दिति के तप के प्रभाव से वे मरे नहीं, किन्तु ४६ मरुत् देवता होगये। (श्री० भा० स्कं० ६ अ० १८) नैरुक्तों के मतमें तो ये सभी मध्यम लोक के आठों गण (८-१५) मरुत् [वायु] ही हैं। जैसा कि-वार्त्तिक में कहा है- “मध्यमा वाक् स्त्रियः सर्वाः पुमान् सर्वश्च मध्यमः। गणाश्च सर्वे मरुतो गणभेदाः पृथक्कृतेः ॥” अर्थात्-अदिति (१६) आदि मध्यम लोक की २८ स्त्रियें मध्यमा वाक् देवता है। मध्यम लोक के वायु आदि, पुरुष देवता मध्यम वायु या इन्द्र देवता है। और मध्यम लोक के सब मरुतः (८) आदि आठ गण देवता मरुत् ही हैं। इन के गण भेद भी कर्म के भेद से कल्पित हैं। ( खं० २ ) निरु०-“ आविधुन्मद्भिर्मरुतः स्वकैरथेभिर्याति ऋष्टिमद्भिरिश्वपर्णैः। आवार्विष्ठया न इषा वयो न पप्तता सुमायाः ॥ ” ( ऋ० सं० १, ६, १४, १ ) ॥ “ विधुन्मद्भि र्मरुतः स्वकैः” स्वञ्चनैः-इति वा, स्वर्चनैः-इति वा, स्वर्चिर्भिः-इति वा, रथैः आयात