निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ४०८ ) ११अ० २पा० ३ खं० ऋष्टिमद्भिः अश्वपर्णैः अश्वपतनैः वर्षिष्ठेन च नः अन्नेन वयः इव आपतत 'सुमायाः' कल्याणकर्मा- णो वा, कल्याणप्रज्ञा वा । 'रुद्रा' व्याख्याताः । तेषामे-एषा भवति- ॥ २ [ १४ ] ॥ अर्थ.-“आविद्युन्मद्भिः०” इस ऋचा का गोतमऋषि है । आस्तार पंक्ति छन्द है । 'मरुतः' हे मरुत् देवो! (यूयम्) तुम सब 'विद्युन्मद्भिः'नि- राली चमक वाले (बिजली वाले ) 'स्वर्कैः' ( स्वञ्चनैः ) सुन्दर गमन वाले ( स्वर्चनैः इति वा ) अथवा सुन्दर पूजन वाले [पूजे जाने वाले](स्वर्चिभि इतिवा)अथवा सुन्दर किरणोंवाले 'ऋष्टिमद्भिः ' आयुधों वाले या अकाल के नाश करने वाले 'अश्वपर्णैः' अश्व (घोड़े) वाहनों वाले या वज्र के गिराने वाले 'रथेभिः' रथों से या मेघों से 'आयात' आओ । 'सुमायाः' (कल्याणकर्माणो वा ) हे सुन्दर कर्मों वाले ! (कल्याणप्रज्ञा वा) या सुन्दर प्रज्ञा (बुद्धि)वाले ! मरुतों!'वर्षिष्ठया' (वर्षिष्ठेन) बड़े श्रेष्ठ 'इषा' अन्नेन) अन्नके सहित 'वयः न' पक्षियों के समान 'आपतत' [आपतत] आओ । 'रुद्र' (९) व्याख्यान किये जाचुके [अ०१०पा०१खं०५ ] । “तेषाम्०” उन रुद्रों की यह ऋचा है ॥२(१४)॥ ( सं० ३ ) निरु०-“आरुद्रास इन्द्रवन्तः सजोषसो हिरण्य-