निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त (४०६) ११ अ० २पा० ३ ख० रथाः सुविताय गन्तन । इयं वो अस्मत् प्रति हर्यते मतिस्तृष्णजे न दिव उत्सा उदन्धवे ॥ ” (ऋ०सं०५, ३, २१, १) ॥ आगच्छत रुद्रा इन्द्रेण सहजोषणः सुविताय कर्मणे इयं वो अस्मदपि प्रति कामर्थते मति- तृष्णजे इव दिव उत्सा उदन्यवे इति । 'तृष्णक्' तृष्यतेः। 'उदन्युः' उदन्यतेः ॥ 'ऋभवः' उरु भान्ति-इति वा । ऋतेन भान्ति- इति वा । ऋतेन भवन्ति- इति वा । तेषाम्- एषा भवति ॥३ (१५)॥ अर्थः-“आरुद्रासः०” यह ऋचा श्यावाश्व ऋषि की है । जगती छन्द और आग्निमारुत में शस्त्र है । 'रुद्रासः' (रुद्राः!) हे रुद्र देवो! (यूयम्)तुम“ इन्द्रव- न्तः-सजोषसः” (इन्द्रेण सह जोषणाः) इन्द्र के साथप्रीति युक्तहोते हुये या इन्द्र नाम ऐश्वर्यसे युक्त होते हुए 'हिरण्य- रथाः' सोने के रथ वाले या जल के हरण के अर्थ रंहण (सर- कने) वाले 'सुविताय' (कर्मणे) सुन्दर सगुण कर्म के लिये वा शास्त्र के अनुसार किए जाते हुए कर्म की प्राप्ति के लिए 'आगन्तन' (-आगच्छत) आओ । 'इयम्'यह 'अस्मत्' आप हमारी भी 'मतिः'मति(बुद्धि)'वः'(युष्मान्)तुम्हारे पास'प्रति-