निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ४१० ) ११ अ० २पा० ३ खं० हर्य्यन्ते' प्रति गमन करती है— जिस प्रकार पहिले से ही तुम हमारे हविः की इच्छा करते हो, उसी प्रकार हमारी बुद्धि भी तुम्हारे प्रति जाती हैकि-'तुम्हारे विना इनअङ्गों से गुण युक्त भी हमारा यह कर्म विगुण (अङ्गहीन) न हो। जिस प्रकार ब्राह्मण पहिले से ही न्यूते की इच्छा करते हैं, उसी प्रकार देवता भी पहिले से हविः की इच्छा करते हैं। इस अर्थ को श्रुति भी कहती है- “देवता वै सर्वा आशंसन्ति ग्रहे गृह्यमाणे मह्यं गृह्णाति” अर्थात्-सब देवता ग्रह(हविः)लिए जाने के समय इच्छा करते हैं कि-मेरे लिये ग्रहण करता है। इसीसे कहा है कि- “हमारी मति तुम्हारे समीप प्रति गमन (गमन के सामने गमन) करती है।” कैसे जाती है? 'तृष्णाजे' ग्रीष्म (गरमी)में 'दिवः' द्युलोकसे 'उदन्यवे' जलके चाहने वाले लोक या चातक के लिए'उत्स्राः न' जैसे मेघ आते हैं । उसीप्रकार तुम हमारे यज्ञ में आओ॥ 'तृष्णाज्' कैसे ? पिपासा अर्थ में 'तृष' (दि० प०) धातु से है। 'उदन्यु' कैसे ? 'उदन्य' नाम धातु से । 'उदन्यु' उदक [जल] की इच्छा करने वाला । 'ऋभु' [१०] कैसे ? ' उरु भान्ति ' वे बहुत चमकते हैं । 'ऋतेन भान्ति इति वा'अथवा वे सत्य से चमकते हैं ।'ऋतेन भवन्ति इति वा' अथवा वे सत्य से होते हैं । “तेषाम्०” उन ऋभुओं की यह ऋचा है ॥३[१५]॥