निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ४३४ ) ११ अ० ३पा० ८खं० “तस्या०” उस वाक् की यह और ऋचा है- जिसका प्रयोजन 'यही वाक् सब प्राणियों के भीतर प्रविष्ट है और यही सब अर्थों को कथन करती है'- इस प्रकार की विभूति दिखाना है ॥७(२८)॥ ( खं० ४ ) निरु०-“देवीं वाचमजनयन्त देवास्तां विश्वरू- पाः पशवो वदन्ति । सा नो मन्द्रेषमूर्जं दुहाना धेनुर्वागस्मानुप सुष्टुतैतु ॥” (ऋ० सं० ६,७,५,५) देवीं वाचम् अजनयन्त देवाः, तां सर्वरूपाः पशवो वदन्ति व्यक्तवाचश्च अव्यक्तवाचश्च सा नो मदना अन्नं च रसं च दुहाना धेनुः वाग् अस्मान् उपैतु सुष्टुता । 'अनुमतिः' 'राका' इति देवपत्न्यौ-इति नैरुक्ताः । पौर्णमास्यौ-इति याज्ञिकाः । पूर्वा पौर्णमासी सा अनुमतिः, या उत्तरा सा राका इति विज्ञायते । 'अनुमतिः' अनुमननात् । तस्या एषा भवति-॥८(२९)॥ अर्थः- “देवींवाच०” इस ऋचा का नेम ऋषि और सारस्वत पशु में विनियोग है । 'देवाः' मध्यम लोक के देवताओं ने 'देवीम्' ( उद्कामां