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भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 1195, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 1195

हिन्दी निरुक्त ( ४३३ ) ११ अ० ३पा० ७ ख० तानि राष्ट्री देवानां निषसाद 'मन्द्रा'मदना 'चतस्रः' अनुदिशः ऊर्जं दुदुहे पयांसि, क्व स्विद् अस्याः परमं जगाम-इति यत् पृथिवीं गच्छति इति वा, यद् आदित्य रश्मयो हरन्ति इति वा०॥ तस्या एषा अपरा भवति—॥ ७ ( २८ ) ॥ अर्थः-“ यद्वाग्वदन्ती० ”इस ऋचा का नेम ऋषि और सारस्वत पशु में विनियोग है । 'यत्' ( यदा ) जब 'अविचेतनानि' [ अविज्ञाताथानि ] अर्थ—शून्य गर्जना शब्दों को 'वदन्ती' बोलती हुई ' देवानां राष्ट्री'माध्यमिक देवताओं की ईश्वरी 'मन्द्रा' [मदना] लोक को हर्ष देने वाली 'वाक्' मध्यम लोक की वाणी 'निषसाद' [ निषीदति = व्यापृणोति ] व्यापार युक्त होती है—वृष्टि कर्म में लगती है, [ तदा ] तब 'चतस्रः' ( दिशः अनु ) चारों दिशाओं के प्रति 'ऊर्जम्' ( अन्नम् ) अन्नको 'पयांसि' और जलोंको ' दुदुहे ' दुहती है = भरती है । 'क्व—स्वित् ' कहां 'अस्याः ( वाचः ) इस वाक् देवी के 'परमम्' उत्कृष्ट ( बड़े ) स्थान को 'जगाम' (गच्छन्ति ) जाते हैं-यह नहीं जाना जाता कि-इस वाक् देवी के बरसाए हुये जल ओषधियों को उत्पन्न करके कहां जाते हैं और प्रतिवर्ष फिर कहां से आते हैं. [ यत् पृथिवीं गच्छति (न्ति) ] जो पृथिवी में रहते हैं ( यद् आदित्य रश्मयो हरन्ति इति वा ) और जिनको आ- दित्य की रश्मिएं हर लेजाती हैं । [ सुतराम् वाग् देवी के अपरिमित जल हैं, वे कभी क्षीण नहीं होते ।