भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1194

हिन्दी निरुक्त ( ४३२ ) ११ अ० ३पा० ७खं० अर्थ:- “महो अर्णः सरस्वती०” इस ऋचा का मधुच्छन्दम् ऋषि, प्रउग शस्त्र में और सारस्वत हविः में विनियोग है। ‘सरस्वती’ मध्यमा वाक् देवी ‘केतुना’ (कर्मणा) कर्म से (प्रज्ञया वा) अथवा प्रज्ञान से ‘महः’ [महत्] बड़े या बहुत ‘अर्णः’ (जलम्) जलको ‘प्रचेतयति’ (प्रज्ञापयति = आविष्करोति) प्रकट करती है। (इमानिच) और इन ‘विश्वा’ [विश्वानि = सर्वाणि] सब ‘धियः’ (प्रज्ञानानि) प्रज्ञानोंको ‘विराजति’ (अभिविराजति) आभिमुख्य = सम्मु- खतासे विराजती है। क्योंकि—जलसे अन्न और अन्नसे सब प्रज्ञान होते हैं, इस प्रकार वह सब प्रज्ञानों की ईश्वरी है॥ “वाग्-अर्थेषु०” क्योंकि-वाक् देवी मन्त्रों में उदक कर्मों में विधान की गई है—उसके उदक वर्षण आदिकर्म कहे गए हैं, इससे नैरुक्त आचार्य वाक् को मध्यम लोक की मानते हैं॥ ‘वाक्’ (१६) का व्याख्यान किया गया [२,७,१]। “तस्याः०” उस वाक् की यह ऋचा है-॥ ६ (२७)॥ (खं० ७) निरु०- “यद्वाग्वदन्त्यवि चेतनानि राष्ट्री दे वानां निषसाद मन्द्रा। चतस्र ऊर्जन्दुदुहे पयांसि क्व स्विदस्र्याः परमञ्जगाम॥” [ऋ०सं० ६,७, ५, ४]॥ यद् वाग् वदन्ती ‘अविचेतनानि’ अविज्ञा-