भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1193

हिन्दी निरुक्त ( ४३१ ) ११ अ० ३ पा० ६ खं० तस्य एषा अपरा भवति ॥५ (२६) ॥ अर्थः— "पावका नः सरस्वती०" इस ऋचा का मधुच्छन्दस् ऋषि है, प्रउग शस्त्र में और सारस्वत हविः में विनियोग है । 'पावका' जलको झारने वाली "वाजेभिः वाजिनीवती (अन्नैः अन्नवती) अन्नों से अन्नवाली 'धियावसुः' (कर्मवसुः कर्मधना) कर्म रूपधनवाली 'सरस्वती' मध्यम लोककी वाणी 'नः' हमारे 'यज्ञम्' यज्ञ को 'वष्टु' (कामयताम्) चाहे = इच्छा करे । अथवा अन्न वाली मध्यमवाक् हमारे यज्ञ के अन्नों से युक्त करे यां करने की कामना करे ॥ "तस्याः०" उस सरस्वती की यह और ऋचा है ॥५(२६)॥ [ खं० ६ ] निरु०— "महो अर्णः सरस्वती प्रचेतयति के- तुना । धियो विश्वा विराजति ॥" [ ऋ० सं० १, १, ६, ६] ॥ महत् अर्णः सरस्वती 'प्रचेतयति' प्रज्ञापयति 'केतुना' कर्मणा प्रज्ञया वा, इमानि च सर्वाणि प्रज्ञानानि अभि विराजति । 'वाक्' अर्थेषु विधीयते तस्माद् माध्यमिकां वाचं मन्यन्ते ॥ 'वाग्' व्याख्याता । तस्या एषा भवति— ६ ( २७ ) ॥