भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1192

हिन्दी निरुक्त ( ४३० ) ११ अ० ३ पा० ५ खं० तुझे पिछली रात्रि सुख से बीती ? और कथं रसायाः पयांसि अतरः", कैसे तैने नदी के जलों को तैरा ? — आधे योजन से अधिक विस्तार वाली रसा नाम नदी है, उस के दुस्तर जलों को तैने कैसे पार किया । (कथं रसानि तानि उदकानि- इति वा ) वे कैसे मीठे जल हैं? क्या तुझे थका- वट के समय कुछ विश्राम स्थानों में वे स्वादु जल मिले ? इन्द्र की भेजी हुई देवशुनी (सरमा) ने पणि असुरों के साथ संवाद किया-यह आख्यान (इतिहास) है ॥ 'जगुरिः (शीघ्रगामी) कैसे ? 'जङ्गम्यतेः' यङन्त 'गम्' धातु से है। क्योंकि-वह अतिशय गमन करने वाला है। 'परितक्म्या क्या ? रात्रि क्यों ? 'परितः एना तक्म' दोनों ओर इसके तक्म (दिन) है। 'तक्म' यह उष्ण (गरम) का नाम है । कैसे ? 'तकते' इस धातु से है। क्यों कि-प्राणियों को वह कष्ट से ओसता है। 'रसा' क्या ? नदी किस धातु से ? 'रसतेः शब्द कर्मणः' शब्द अर्थ में 'रस' (भ्वा० प०) धातु से है। 'सरस्वती (१८) की व्याख्या हो चुकी [२,७,१) “तस्या०”उस (सरस्वती)की यह ऋचा है ॥४(२५)॥ ( खं० ५ ) निरु०- पावका नः सरस्वती वाजेभिर्वाजिनी- वती । यज्ञं वष्टु धियावसुः ॥” [ऋ० सं० १, १, ६, ४ । य० वा० सं० २०, ८४ ) ॥ पावका नः सरस्वती अन्नैः अन्नवती यज्ञं वष्टु धियावसुः, कर्मवसुः