भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 1191, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1191

हिन्दी निरुक्त ( ४२६ ) ११ अ० ३पा० ४ खं० कथं रसानि तानि उदकानि-इति वा । देवशुनी इन्द्रेण प्रहिता पणिभिः असुरैः समूदे- इत्याख्यानम् । ‘सरस्वती’ व्याख्याता । तस्या एषा भवति- ॥ ४ (२५) ॥ अर्थ:-“किमिच्छन्ती०” । ऐसा सुना गया है कि— देवपणि असुरोंने देवताओं की गौओं को हर लिया था, फिर इन्द्रने उनके ढूंढनेके अर्थ उनके स्थान में सरमा (देव-कुत्ती) को भेजा। और उन देव पणिओं ने उसे देख कर इस ऋचा से पूछा-किमिच्छन्ती०” हम से किस वस्तु की इच्छा करती हुई ‘इदम्’ यहां ‘प्रानट्’ आई है, “दूरे हिअध्वा” क्यों कि-- दूर मार्ग है— इतने दूर मार्ग से बिना प्रयोजन कोई सहज में आनहीं सकता, ‘जगुरिः’ जो ही शीघ्र चलने वाला हो, वही आसकता है। ‘पराचैः’ (पराङ्मुखैः अञ्चितः) पराङ्मुख गमनों से गया हुआ है- यह मार्ग अरुचि यह शि- थिल संकल्प से पार करना दुष्कर है- देवताओं के स्थान से बहुत दूर है। इससे हम कहते हैं- हे सरमे ! “का अस्मै हितिः” ( का तव अस्मासु अर्थहितिः आसीत् ) क्या तेरी हम में अर्थ हिति = अर्थ की प्रार्थना है-क्या अर्थ तैनें हम से प्राप्त करने योग्य विचारा है, जिसके कारण यह बड़ा लम्बा मार्ग आना विचारा । और “का परितक्म्या आसीत्” (कि परितकनम्) कौन या कैसी रात्रि हुई- क्या